रामकिशन शर्मा ‘साइल देहलवी’ : एहसास और तहज़ीब के शायर
इमरोज़ नदीम

RNE Special.
उर्दू अदब की तारीख़ जब भी अपनी रौशन सतहों को खोलती है, तो कुछ नाम ऐसे सामने आते हैं जो महज़ शायर नहीं रहते, बल्कि एक मुकम्मल रवायत, एक तहज़ीब और एक ज़माने की आवाज़ बन जाते हैं। रामकिशन शर्मा ‘साइल देहलवी’ भी ऐसी ही एक नायाब शख्सियत थे, जिनकी शायरी में सादगी की रवानी, एहसास की गहराई और फ़िक्र की पुख़्तगी एक साथ दिखाई देती है।

उनका अस्ल नाम रामकिशन शर्मा था और यही पहचान अपने आप में उर्दू अदब की उस गंगा-जमुनी तहज़ीब की जिंदा मिसाल है, जहाँ ज़बान मज़हबी या सामाजिक सरहदों में क़ैद नहीं रहती, बल्कि इंसानियत की साझा आवाज़ बन जाती है। साइल देहलवी ने अपनी शायरी के ज़रिये इसी साझा तहज़ीब को न सिर्फ़ ज़िंदा रखा, बल्कि उसे नई ताज़गी भी बख्शी।
साइल देहलवी की शायरी का सबसे बड़ा गुण उसकी सादगी है मगर यह सादगी सतही नहीं, बल्कि गहरी और असरदार है। वह अल्फ़ाज़ का बोझ नहीं डालते, बल्कि बात को ऐसे कहते हैं कि वह सीधे दिल में उतर जाती है। उनके यहाँ बनावट नहीं, बल्कि सच्चाई है, दिखावा नहीं, बल्कि एहसास है। यही वजह है कि उनका हर शेर पढ़ने वाले के दिल में एक हल्की-सी लहर पैदा करता है।
यही सादगी उनके कलाम के इन अशआर में भी पूरी शिद्दत से महसूस होती है—
“अपनी ख़ामोश ज़ुबां से…
बना ली, अपनी ख़ामोशी ही बस, अब तो ज़ुबां हमने,
किया है, हाल-ए-दिल को, अपनी सूरत से अयाँ हमने…”
इन पंक्तियों में जो खामोशी की ज़बान है, वही साइल का असल अंदाज़ है कम कहकर ज़्यादा कह देना।
उनकी शायरी का बड़ा हिस्सा इंसानी जज़्बात की सच्ची तर्जुमानी करता है। इश्क़ उनके यहाँ महज़ रूमानी तजुर्बा नहीं, बल्कि एक तहज़ीबी और रूहानी एहसास बनकर सामने आता है—
“मताए-दिल, लुटा दी, क्या-किया, जोशे-मोहब्बत में,
जहां वालों पे, जाहिर कर दिया, दर्द-ए-निहाँ हमने…”
यहाँ इश्क़ में इज़हार भी है और एक सलीक़ा भी जो साइल को आम शायरों से अलग करता है।

मगर साइल देहलवी सिर्फ़ इश्क़ के शायर नहीं थे उनकी शायरी में ज़िंदगी की हक़ीक़तें भी उसी शिद्दत से मौजूद हैं। वह ख्वाबों में खो जाने वाले शायर नहीं, बल्कि ज़िंदगी को उसकी अस्ल सूरत में देखने और दिखाने वाले शायर हैं—
“हक़ीक़त है…
नहीं देखा, कभी वो जोश, दरिया की रवानी में,
जो देखा है, किसी मासूम की, उठती जवानी में…”
यहाँ तजुर्बा और मुशाहिदा दोनों एक साथ काम कर रहे हैं।
उनके कलाम में दर्द भी है, मगर वह शोर नहीं मचाता बल्कि एक खामोश लहजे में दिल तक पहुँचता है—
“अपना दर्द-ए-निहाँ…
खुशियां तमाम तुम पे, लुटा कर जहाँ की,
ले कर अब अपना, दर्द-ए-निहाँ जा रहे हैं हम…”
यह दर्द शिकायत नहीं, बल्कि एक सलीकेदार इज़हार है जो दिल को छू जाता है।
साइल देहलवी की शायरी का एक और अहम पहलू उनकी इंसानियत-पसंद सोच है
“ये भारत है, कि हम हिन्दू-मुसलमानों ने मिल-जुल कर,
मनाई है खुशी की ईद और दीवालियां हमने ”
यह शेर सिर्फ़ एक जुमला नहीं, बल्कि पूरी तहज़ीब का बयान है।
उनकी शायरी में तसव्वुर की उड़ान भी है और तजुर्बे की ठोस ज़मीन भी।
वे कहते हैं
“तमन्ना है…
न ख़्वाहिश मेरी, चाँद-तारों से खेलूं,
तमन्ना है, तूफानों के धारों से खेलूं ”
यहाँ जज़्बा, हिम्मत और शख्सियत की बुलंदी साफ़ नज़र आती है।

साइल देहलवी की शख्सियत भी उनके कलाम की तरह सादा, मुतवाज़िन और पुरअख़लाक़ थी। वह शायरी को महज़ एक फ़न नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी समझते थे।
उनकी अदबी विरासत को महफ़ूज़ करने में उनके साहबज़ादे मुकेश शर्मा का किरदार बेहद क़ाबिले-तारीफ़ है। मुकेश शर्मा साहब न सिर्फ़ खुद एक शायर हैं, बल्कि आकाशवाणी में एनाउंसर के तौर पर भी अपनी पहचान रखते रहे हैं। उनका तालीमी और अदबी सफ़र भी काफ़ी वसीह रहा है पत्रकारिता और जनसंचार से जुड़ी उनकी तालीम ने उन्हें एक सजग और समझदार अदबी शख्सियत बनाया।
सबसे अहम बात यह है कि उन्होंने अपने वालिद साइल देहलवी साहब के बिखरे हुए कलाम को बड़ी मेहनत, लगन और मुहब्बत से यकजा किया। यह काम सिर्फ़ संकलन का नहीं, बल्कि एक अदबी अमानत की हिफ़ाज़त का काम था। अगर यह कोशिश न होती, तो मुमकिन था कि साइल देहलवी साहब का बहुत-सा कलाम वक्त की गर्द में गुम हो जाता।
साइल देहलवी के फ़न की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनके समकालीन अहले-अदब ने भी उनके कलाम को सराहा। मोहम्मद अब्दुल्ला साहब ‘बेदिल’ बीकानेरी का तास्सुर इस सिलसिले में खास तौर पर क़ाबिले-ज़िक्र है। उन्होंने साइल देहलवी के कलाम में जो पुख़्तगी, गहराई और असर देखा, वह इस बात की दलील है कि साइल शुरू ही से एक मजबूत और अलग आवाज़ थे।
साइल देहलवी साहब की शायरी पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि वह अपने दौर से भी जुड़े हुए थे और उससे आगे की सोच भी रखते हैं। वह सिर्फ़ अपने जज़्बात का बयान नहीं करते, बल्कि अपने पाठक को सोचने, महसूस करने और समझने की दावत भी देते हैं।
आज जब हम उर्दू अदब की बात करते हैं, तो यह महसूस होता है कि साइल देहलवी जैसे शायरों ने इस ज़बान को सिर्फ़ लफ़्ज़ नहीं दिए, बल्कि एक रूह दी है।
वे आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनका कलाम आज भी ज़िंदा है, महसूस किया जा रहा है।
रामकिशन शर्मा ‘साइल देहलवी’ एक नाम नहीं, बल्कि एक एहसास, एक रवायत और एक अदबी विरासत हैं।

