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प्रभारी रंधावा पर सिद्धू के आरोपों से हलचल, राजस्थान को लेकर लगे है रंधावा पर आरोप

जबकि राज्य के नेताओं की कोई प्रतिक्रिया नहीं
क्या भीतरखाने चल रही कोई सियासत
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.


राजस्थान में कांग्रेस की सियासत नित नए मसले से उलझी ही रहती है। पिछली गहलोत सरकार के समय सचिन पायलट व अशोक गहलोत आमने - सामने थे। खुलकर एक दूसरे पर तंज भी कस रहे थे। गहलोत ने जहां नाकारा, निकम्मा, रगड़ाई आदि के बयान से पायलट पर कड़ें प्रहार किए तो पायलट भी कुछ विधायकों के साथ मानेसर जाकर बैठ गये। आलाकमान को गहलोत से अपनी नाराजगी का इजहार किया।

उस समय आलाकमान ने मल्लिकार्जुन खड़गे व  अजय माकन को विधायक दल की बैठक लेने भेजा, मगर गहलोत समर्थक विधायकों ने खुली बगावत कर दी। उन्होंने नेतृत्त्व परिवर्तन पर बात के लिए बुलाई गई बैठक में जाने के बजाय विधानसभा अध्यक्ष को अपने इस्तीफे धमकी के साथ दे दिए। इन विधायकों ने धमकी दी कि यदि गहलोत को सीएम पद से हटाया गया तो उनके इस्तीफे स्वीकार कर लिए जायें। यह आलाकमान को खुली चुनोती थी। उस समय बात यहीं तक नहीं रुकी। उन विधायकों ने प्रभारी अजय माकन पर भी पक्षपात के आरोप लगाये और उनको हटाने की मांग की। माकन को हटाया भी गया। गहलोत ने सोनिया गांधी से इस स्थिति के लिए खेद भी प्रकट किया। मगर उस समय से ही गहलोत व पायलट के मध्य दीवार खड़ी हो गयी। पार्टी ने पंजाब के सीनियर नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा को राजस्थान का प्रभारी बना दिया, जो अभी तक प्रभारी है।
 

पंजाब से रंधावा पर आरोप:
 

कांग्रेस नेता व पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिद्धू की अभी पार्टी नेतृत्त्व से नहीं बन रही। उनकी पत्नी व पंजाब सरकार की पूर्व मंत्री श्रीमती नवजोत सिद्धू ने ताबड़तोड़ रंधावा पर आरोप लगाकर उन्हें कटघरे में खड़ा कर दिया है। 

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श्रीमती सिद्धू ने रंधावा पर आरोप लगाया कि उन्होंने राजस्थान विधानसभा चुनाव के समय पार्टी के टिकट अच्छी रकम लेकर बेचे। जिसके कारण पार्टी को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह के कई आरोप उन्होंने रंधावा पर लगाये। जिन पर रंधावा ने उनको मानहानि का कानूनी नोटिस भी दिया है। श्रीमती सिद्धू ने आलाकमान पर भी सीएम बनाने के लिए पैसे लेने का आरोप जड़ दिया। पंजाब कांग्रेस ने उन पर अनुशासनहीनता की कार्यवाही कर दी है, पर इससे रंधावा व राजस्थान सुर्खियों में आ गए है। एक सियासी हलचल शुरू हो गयी है।
 

राज्य के नेताओं की चुप्पी:
 

पंजाब से प्रभारी रंधावा पर पार्टी के टिकट बेचने के आरोप लगे है, मगर राजस्थान के किसी भी नेता ने अब तक ऐसी कोई बात नहीं कही है। श्रीमती सिद्धू के आरोपों पर कोई नेता कुछ भी नहीं बोला है। जबकि विधानसभा चुनाव को 2 साल हो गए, किसी ने भी रंधावा पर इस तरह की कोई टिप्पणी नहीं की। 

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रंधावा सक्रिय रहे है राज्य में:
 

रंधावा के पक्ष में राजस्थान की राजनीति के कई तर्क है। विधानसभा चुनाव पार्टी हारी, मगर 70 से अधिक विधायक जीते। जबकि उससे पहले जब पार्टी हारी तो 22 विधायक ही जीते थे। गहलोत के दबाव में सर्वे रिपोर्ट के विपरीत जाकर भी कुछ मंत्रियों को टिकट दिए गए जो चुनाव हारे, यह बात रंधावा ने सार्वजनिक रूप से कही और यह भी कहा कि मैं अत्यधिक कड़ाई नहीं कर पाया, नहीं तो कुछ फायदा और होता।
लोकसभा चुनाव के समय भी प्रभारी रंधावा ही थे। दो चुनावों से राज्य में कांग्रेस 25 में से 1 सीट भी नहीं जीत पा रही थी, मगर इस बार इंडिया गठबन्धन ने 11 सीटें जीती। अभी हाल ही में अंता उप चुनाव में भाजपा से सीट छीनी। चुनाव परिणाम की दृष्टि से रंधावा की परफॉर्मेंस कमजोर तो नहीं।

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भीतरखाने की सियासत:
 

रंधावा पर जो आरोप लगे है वो मोटे तौर पर पंजाब कांग्रेस की राजनीति के कारण लगे है, प्रथम दृष्टया यही लगता है। जानकारों का कयास है कि राज्य की गुटबाजी भी कहीं रोल प्ले कर रही है। वो सामने नहीं आयी। राज्य में कांग्रेस अब नेतृत्त्व को लेकर बड़े परिवर्तन का मानस बना रही है, उसे प्रभावित करने की भी कोशिश हो सकती है। आने वाले समय में संभव है आलाकमान पहले प्रभारी बदले, फिर नेतृत्त्व। ताकि गुटीय सियासत पर शिकंजा कसा जा सके।

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