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World poetry Day : कविता के पाठक निरंतर घट रहे, चिंता की बात, कविता जबसे पढ़ने की चीज बनी, तबसे पाठक घटे

कविता के आलोचक घटे, कविता पिछड़ी
बीकानेर की उज्ज्वल काव्य परंपरा पर भी संकट
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.


साहित्य की सर्वाधिक प्राचीन व प्रभावी विधा कविता है। एक समय में हर लिखे को काव्य ही कहा जाता था। कविता की भारतीय साहित्य परंपरा में खास जगह है। हिंदी और राजस्थानी में कविता की एक समृद्ध परंपरा राजस्थान व बीकानेर में देखने को मिलती है। 
 

मगर वर्तमान बहुत चिंता देने वाला है। आज सबसे अधिक पिछड़ी हुई व नापसंद की जाने वाली कोई विधा है तो वह है कविता। लोगों ने कविता को सबसे आसान विधा मान लिया है। आड़ी तिरछी पंक्तियां, एक छोटी तो एक बड़ी पंक्ति, एक होली की बात तो दूसरी दीपावली की, बस उसे ही कविता मान लिया है कुछ कथित, स्वयंभू कवियों ने। कुछ आलोचकों ने उनको झाड़ पर चढ़ा भी दिया है, जहां से अब उनको निराला, महादेवी, मुक्तिबोध, नागार्जुन तक छोटे कवि लगते है। संभवतः इन दुर्गुणों के कारण ही हिंदी व राजस्थानी कविता आईसीयू में पहुंच गई है। वेंटिलेटर पर है। आश्चर्य तो इस बात का है कि ये कथित कवि फिर भी चिंतित नहीं, फतवे देने वाले स्वयम्भू आलोचक भी चुप है। आज भी फेसबुक पर कईयों ने विश्व कविता दिवस पर भड़ास निकाली हुई है। कईयों ने कविताएं लिख मारी है तो कईयों ने कविताओं पर ज्ञान की वोमेटिंग कर रखी है। 
 

जिनको खुद को कविता लिखने क्या पढ़ने तक का सऊर नहीं, उन्होंने कविता पर ज्ञान झाड़ा हुआ है। जैसे कविता की चिंता उनको ही है, वे ही कविता की ताकड़ी लेकर बैठे है। उनको ही न्याय करना है कि कौनसी कविता है और कौनसी नहीं। 

कुछ बातें भी जानिये ...

पहली बात -- पहले यह कविता को लेकर बीकानेर में प्रचलित थी कि एक पत्थर उठाकर फेंको, वो जिस पर गिरेगा वो कवि निकलेगा। अब तो स्थिति इससे भी बदतर हो गयी। पत्थर जिस पर गिरेगा वो और उसके आसपास खड़े सभी कवि निकलेंगे, अपने आप में। कविता की स्थिति को समझा जा सकता है।

 

दूसरी बात -- एक लोकार्पण समारोह में एक अतिथि कवयित्री को दूसरी महादेवी वर्मा बता रहे थे। कवयित्री सकुचा रही थी इस बात पर, मगर वे अतिथि उसे छायावाद की नई उपलब्धि बताने में लगे थे। जबकि अतिथि खुद बड़े भद्दे व विफल कवि थे। वे आयोजन के बाद मंच से नीचे उतरे तो मैंने कहा थोड़ा छायावाद के बारे में बताइए। वे मुस्कुराए, मुझे पूर्ण अज्ञानी होना मान लिया और बोले - जो शब्द बोले जा रहे है अर्थ उसमें नहीं उसके पीछे छिपा हो, उसे छायावाद कहते है। आगे सुनने की जरूरत नहीं थी, चलने में ही भलाई थी।
 

तीसरी बात -- साहित्य के एक स्वयम्भू बड़े आलोचक व अपने चेलों के चहेते, उनकी वाणी को सच मान खुद को सच में सृष्टि का पहला बड़ा कवि व पहला श्रेष्ठ आलोचक माने हुए ' वे ' एक आयोजन में बोल रहे थे। एक एक करके सब कवियों को खारिज कर दिया। कुछ भी अच्छा नहीं। मगर वो अच्छे है या नहीं, ये झांककर देखने की उन्होंने कभी जेहमत भी नहीं की। चेलों के लिए कविता गुरु है, फिर खुद को क्या देखना ? 

थोड़ा इनको तो पढ़ लो  ..

बीकानेर के कवियों को सलाह देना वैसे तो सही नही, क्योंकि इसकी उनको दरकार नहीं। मगर फिर भी, आग्रह है उनसे। देश के बड़े कवियों को भले ही न पढ़े मगर अपने शहर के इन कवियों को जरूर पढ़ लें।

 

रामदेव आचार्य, योगेंद्र किसलय, नंदकिशोर आचार्य, हरीश भादानी, मोहम्मद सदीक, धनंजय वर्मा, बुलाकी दास ' बावरा ', सरल विशारद, शिवराज छंगाणी, एल एन रंगा, श्रीहर्ष आदि। कईयों के नाम लिखे नहीं, इसका अर्थ ये नहीं कि उनको नहीं पढ़ने का कह रहा हूं। दरअसल नाम नहीं, बीकानेर की काव्य परंपरा को अवश्य पढ़ लें, जान ले। तो भी सुधार हो जायेगा। 
 

विश्व कविता दिवस सार्थक हो जायेगा।

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