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नेताओं के पुत्रों की राजनीति पर दिया गया बयान गर्माया, परिवारवाद के सवाल गहलोत पर ही खड़े हुए

भाजपा नेताओं पर किया प्रहार उलटा पड़ गया
गहलोत ने कहा कि बयान को गलत समझा गया, सरकार व राजनीति में फर्क
राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप थम नहीं रहे
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.
 

राजनीति में जादूगर के रूप में मशहूर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बारे में राजनीतिक विश्लेषक कहते है, वे राजनीति को पार्ट टाइम जॉब नहीं मानते। वे मुक्कमिल तौर पर राजनीति करते है। इस वजह से ही वे केंद्र में मंत्री रहे और 3 बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे, वह भी हर बार पूरे 5 साल। कुल मिलाकर 15 साल उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में काम किया है। इस तरह के गिने चुने ही राजनेता होते है।

गहलोत की राजनीति अलग तरह की है, वे कभी भी उतावलेपन में राजनीति नहीं करते। हर निर्णय में कुछ समय लेते है और उचित समय पर ही चोट करते है। राज्य में उनकी राजनीति व उनके कद को चुनोती इस कारण ही नहीं मिली । मगर पिछली सरकार में पहली बार उनको भीतर से ही चुनोती मिली
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गहलोत को यह चुनोती युवा राजनेता सचिन पायलट ने दी। दोनों की राजनीतिक टकराहट में शह और मात का खेल चला।  गहलोत की सरकार के सामने भी पहली बार संकट खड़ा हुआ। हालांकि गहलोत ने तमाम स्थितियों के बाद भी कार्यकाल पूरा किया। मगर इस गुटबाजी से आलाकमान के सामने उनकी छवि जरूर प्रभावित हो गयी। वहीं सचिन पायलट का कद बढ़ गया।

पहली बार राज्य में समानांतर रूप से कांग्रेस के दो धड़े बने, जो आज भी कायम है। कांग्रेस गहलोत व पायलट गुटों में बंटी हुई दिखती है। यह गहलोत को अपने राजनीतिक जीवन मे पहली बार मिली हुई चुनोती है। इस गुटबाजी का खमियाजा कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में उठाना भी पड़ा है। आलाकमान गुटबाजी की इस उलझी हुई गुत्थी को अब तक सुलझा नहीं पाया है।

नेताओं के पुत्रों पर बयान:

अशोक गहलोत जब जब विपक्ष में होते है तब तब वे अपने बयानों से सुर्खियों में बने रहते है। उनके बयान गूढ़ राजनीतिक चालों के होते है। उनके बयानों से सियासत में गर्माहट रहती है। वो गर्माहट जब शांत होती है तब वे एक और बयान देकर राजनीतिक हलचल बढ़ा देते है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि गहलोत के बयान एक शालीन भाषा की परिधि में रहते है और पूर्णतः राजनीतिक होते है। उनकी जुबान बयानों में नहीं फिसलती है। 

अभी फिर गहलोत अपने एक ताजा बयान के कारण सुर्खियों में है। इस बयान से कुछ ज्यादा ही राजनीतिक हलचल व गर्माहट बढ़ गयी है। ये बयान कई तरह के इतर प्रभाव भी पैदा कर रहा है। गहलोत के इस बयान से भाजपा को हमलावर होने का मौका मिला, क्योंकि उन्होंने अपरोक्ष रूप से राज्य के बड़े नेताओं के पुत्रों को इस बयान के केंद्र में रखा था। 
 

मीडिया में गहलोत का जो बयान सामने आया उसमें कहा गया कि बड़े नेताओं यानी मुख्यमंत्री, मंत्री आदि के पुत्रों को दूर रहना चाहिए।बयान में ये उभरा कि राजनीति से दूर रहना चाहिए।

भाजपा ने तुरंत हमला बोला:

गहलोत का यह बयान आते ही भाजपा नेता उन पर हमलावर हो गए। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़, पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र राठौड़, वित्त आयोग अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी आदि नेताओं ने गहलोत पर हमला बोल दिया। इनका कहना था कि गहलोत ने खुद अपने पुत्र वैभव गहलोत को दो बार लोकसभा का  चुनाव लड़ाया। अब वे इस तरह की बातें बोल रहे है। तीन दिन तक भाजपा नेता गहलोत के इस बयान के खिलाफ में लगातार बोलते रहे। तब तक गहलोत कुछ नहीं बोले। भाजपा नेताओं को लग रहा था कि गहलोत ने इस बयान के जरिये सीएम भजनलाल के पुत्र पर हमला बोला है। इस कारण इस बयान से राजनीतिक गर्माहट बढ़ी थी।
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गहलोत के स्पष्टीकरण ने बदल दिया रुख:

काफी राजनीतिक विवाद होने के बाद आखिरकार अशोक गहलोत ने भी दो दिन पहले मुंह खोला और अपने बयान को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि मैंने कहा था कि पुत्रों को सरकार से दूर रखना चाहिए, राजनीति की बात ही नही कही थी। उनका कहना था कि सरकार में जब पुत्र साथ होते है तो कई तरह के आरोप लगते है।

उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब मैं मुख्यमंत्री था तो मेरा पुत्र मेरे मुख्यमंत्री आवास में मेरे साथ नहीं रहता था। वह जयपुर में ही किराये के घर मे रहता था। मैंने यह सावधानी बरती थी। उसी बात को मैने कहा था। चुनाव कोई नेता पुत्र लड़ता है तो उसका फैसला तो जनता करती है। इस कारण मैने उनके राजनीति में होने को गलत नहीं बताया। सरकार हो तो वे साथ न रहे, यह कहा था। उनका कहना था कि सरकार के समय जो साथ रहते है उन पर लगे आरोप देख लीजिए।

जादुगिरी के सामने फिर हुए विफल:

अशोक गहलोत के स्पष्टीकरण के बाद कोई भी भाजपा नेता बोल ही नहीं पा रहा है। बोलने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं बचा है। गहलोत एक बार फिर जादुगिरी के बयान से भाजपा को बैकफुट पर ले आये है।

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