Movie prime

भाजपा में भी कोई स्थान नहीं बना सके है ये नेता, पहले संगठन में पद मिलने की आस थी, वो टूट गयी

अब क्या राजनीतिक नियुक्तियों में जगह मिलेगी ?
घर वापसी की भी चाह मन में चल रही है
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
f

RNE Special.

पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव के समय कई बड़े नेताओं ने कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा का दामन पकड़ लिया था। भाजपा ने भी इन नेताओं का गर्मजोशी से स्वागत किया। तब इन नेताओं को लगा कि वे भाजपा में अपना स्थान बना लेंगे, क्योंकि कांग्रेस में उनका कद कोई छोटा नहीं था। ये नेता कांग्रेस छोडकर व भाजपा में आकर अपने को काफी खुश महसूस कर रहे थे। 

लालचंद कटारिया, ज्योति मिर्धा, रिछपाल मिर्धा, राजेन्द्र यादव, महेन्द्रजीत सिंह मालवीय, बैरवा आदि अनेक कद्दावर नेता है जिन्होंने कांग्रेस छोड़ी और भाजपा ज्वाइन की। अब वे छटपटाहट महसूस कर रहे है। 
क्योंकि कुछ नेताओं को ही भाजपा ने अपने यहां अवसर दिया। ज्योति मिर्धा को पार्टी ने लोकसभा व विधानसभा, दोनों का भाजपा से टिकट दिया। वे चुनाव नहीं जीत सकी। महेन्द्रजीत सिंह मालवीय कांग्रेस से विधायक थे। इस्तीफा दिया, भाजपा ने लोकसभा का टिकट दिया। पर चुनाव हार गए। अब विधायक भी नहीं है। मगर बाकी नेता तो अब भी कुछ पाने की आस में भाजपा नेतृत्त्व की तरफ टकटकी लगाए देख रहे है। अपने एडजेस्ट होने की प्रतीक्षा कर रहे है। उम्मीद करते करते थक भी गये है। उनको समझ नहीं आ रहा कि अब क्या करें।

 

संगठन में भी पद बंट गए:
 

कांग्रेस छोड़कर आये इन नेताओं को पहले ये उम्मीद थी कि उनको भाजपा संगठन में स्थान मिल जायेगा। मगर पहले जिलाध्यक्ष बने, वहां नम्बर नहीं आया। जाहिर है भाजपा संगठन के प्रमुख का पद तो अपने ही कैडर को ही देती है। मगर कुछ छोटे नेताओं को जिले की कार्यकारणी में स्थान नहीं मिला।

बड़े नेताओं को उम्मीद थी कि प्रदेश में उनको पदाधिकारी बना एडजेस्ट किया जायेगा। मगर वहां भी उनके हाथ केवल निराशा लगी। केवल ज्योति मिर्धा को ही प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया। प्रदेश संगठन में स्थान न मिलने से कांग्रेस छोड़कर आये इन नेताओं में निराशा का आना स्वाभाविक ही था।
 

राजनीतिक नियुक्तियों में आस बाकी:
 

अब केवल राजनीतिक नियुक्तियां बची हुई है। उनसे आस करना कोई वाजिब भी नहीं लगता। क्योंकि भाजपा के अनेक पुराने नेता नियुक्तियों की कतार में है। प्रमुख पदों पर तो भाजपा के नेता जी खप जाएंगे। राजेन्द्र राठौड़, सतीश पूनिया, सुरेंद्र पाल सिंह टीटी, बिहारी लाल विश्नोई आदि वे नेता है, जिनको नियुक्तियों में प्राथमिकता मिलेगी।

ठीक इसी तरह संभाग व जिला स्तर पर भी नियुक्तियों में प्राथमिकता भाजपा अपने ही नेताओं व कार्यकर्ताओं को देगी। जाहिर है, उनको प्राथमिकता नियुक्तियों में मिलना बहुत मुश्किल है। ये बात उन नेताओं को भी पता है जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गये है। इन नेताओं के साथ एक दिक्कत अभिव्यक्ति भी है। कांग्रेस में अनुशासन का डंडा इतना कड़ा व मजबूत नहीं था, वहां वे मन की बात बोल लेते थे। भाजपा में तो इनको बहुत ही नियंत्रित रहना पड़ता है, मुंह खोलने से पहले सोचना पड़ता है। इस कारण ही ये नेता भीतर ही भीतर कसमसा रहे है।
 

पंचायत - निकाय चुनाव की फांस:
 

आने वाले समय में पंचायत व स्तानीय निकायों के चुनाव है, उससे थोड़ी सी उम्मीद इन नेताओं को है। शायद इनमें उनको अवसर मिल जाए। हालांकि उम्मीद तो कम है। 

इस वजह से ही कई नेता घर वापसी की भी सोच रहे है। कांग्रेस को पंचायत व निकाय के चुनाव लड़ने है तो वो नेताओं को वापस पार्टी में ले रहे है। ये चुनाव हो गए तो शायद कांग्रेस में भी उनके द्वार बंद हो जाएंगे। पार्टी छोड़कर जाने वालों के पास पंचायत व निकाय चुनाव एक बड़ा अवसर है, इसमें जो भी निर्णय कर लेंगे, वो स्थायी हो जायेगा। बाद में तो उनके पास कोई राजनीतिक अपॉरचुनिटी या अवसर बचेगा भी नहीं।

FROM AROUND THE WEB