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ट्रैफिक सिगनल पूरे नहीं, कुछ ही चौराहों पर व्यवस्था, केवल हेलमेट चालान काटना ही ट्रैफिक सुधार नहीं

ट्रैफिक पुलिस की नफरी बढ़ाने की जरूरत
 
 

दीपक रामावत
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RNE Special.
 

बीकानेर सम्भवतः राज्य का इकलौता ऐसा संभाग मुख्यालय होगा जहां की ट्रैफिक व्यवस्था किसी बड़ी तहसील से भी ज्यादा बुरी है। जिसके कारण छोटी छोटी दुर्घटनाएं रोज होती है। चोटिल होने वालों में अधिकतर बुजुर्ग, महिलाएं व बच्चे होते हैं। पैदल चलने वालों को भी बच बचकर चलना पड़ता है। कोई चोटिल न हो तो उसका श्रेय उसकी किस्मत को ही है, ट्रैफिक व्यवस्था को नहीं।
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इतना विस्तार पा गया है बीकानेर कि अब तो ट्रैफिक की अव्यवस्था आम नागरिकों को भी अखरने लगी है। लोग बुजुर्गों को तो घर से अकेले निकलने से रोकने लगे हैं। बच्चों पर तो अकेले जाने में पूरी तरह पाबंदी है। ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर इतना भय सभ्य समाज के लिए सही तो नहीं है। 
 

सुनो सरकार, बीकानेर में ट्रैफिक नियमों की सख्ती से पालना की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी जरूरत लोगों में ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूकता की है। आम नागरिकों को पहले ट्रैफिक नियम बताने और उनके लिए जागरूक करने की है। इसे एक सघन अभियान चलाकर ही पूरा किया जा सकता है। जो यहां की बड़ी जरूरत है। इस तरफ ध्यान देकर बहुत सी छोटी दुर्घटनाओं और बड़े हादसों की संभावनाओं को रोका जा सकता है। ये बीकानेर ट्रैफिक की सच्चाई है।

पूरे ट्रैफिक सिग्नल ही नहीं है:

ट्रैफिक सिग्नल के मामले में तो बीकानेर बहुत दरिद्र है। म्यूजियम चौराहा, गजनेर रोड चौराहा, पब्लिक पार्क के बाहर ही ऐसी जगहें हैं, जहां ट्रैफिक सिग्नल है। बत्तियां जगती - बुझती है। मगर दीनदयाल सर्किल जैसे नाजुक चौराहे पर तो ट्रैफिक सिग्नल ही नहीं है, न यहां ट्रैफिक सिपाही खड़ा रहता है। इसके अलावा दुर्गादास सर्किल, मेजर पूर्णसिंह सर्किल जैसे अत्यधिक व्यस्त चौराहों पर भी ट्रैफिक सिग्नल नहीं है। गोगा गेट चौराहा, गंगाशहर चौराहा आदि पर भी ट्रैफिक सिग्नल नहीं है।

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बीकानेर के उन सभी चौराहों व तिराहों को चिन्हित किया जाना चाहिए जहां ट्रैफिक अधिक है और भारी वाहन भी निकलते हैं। इसके लिए एक वृहद कार्य योजना बनाकर उसे अमली जामा पहनाने की जरूरत है। उसके बाद बजाय चालान के,  पहले ट्रैफिक रूल्स से लोगों को परिचित कराना जरूरी है। इस शहर के हित में विशेष कार्य ट्रैफिक को लेकर किया जाना अब बेहद आवश्यक है। क्योंकि शहर की जनसंख्या बढ़ गयी है और वाहन भी अधिक हो गए हैं। कंडम टैक्सियों को ट्रैफिक से अलग किया जाना बहुत जरूरी है।

केवल हेमलेट चालान से पार नहीं पड़ेगी:

अगर ट्रैफिक पुलिस की तरफ से हेलमेट चालान की संख्या देखी जाएगी तो यह लगेगा कि बहुत सख्ती से नियमों की पालना हो रही है, मगर यह भी सच नहीं है। अब भी अवधि पार तिपहिया वाहन बी - 2 शहर होने के बाद भी धड़ल्ले से चल रहे हैं। उनको लेकर सख्ती की जरूरत है।

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ठीक इसी तरह बच्चों को वाहन चलाते हुए भी देखा जा सकता है। उससे दुर्घटना की संभावना रहती है। बाल चालकों को रोकना जरूरी है। लोग दुपहिया वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करते रहते हैं, इस कारण अनेक बार दुर्घटनाए हुई है। इस वृत्ति को कड़ाई से रोकना चाहिए। कृषि के उपयोग के लिए अधिकृत वाहन शहर में सामान ढोते दिखते हैं और कई बार दुर्घटनाओं की वजह बने है। इनको कभी पकड़ा ही नहीं जाता। जहां सख्ती की जरूरत है, होनी चाहिए, बिना दबाव सहे। क्योंकि इससे नागरिको का हित जुड़ा हुआ है।

नफरी होगी, तब सुधार होगा:

ऐसा नहीं है कि ट्रैफिक पुलिस यह सब जानती नहीं या करना नहीं चाहती। वो भी अपने शहर के नागरिकों के सफर को सुगम बनाना चाहती है। मगर उसके लिए प्रयाप्त साधन और पुलिसकर्मी भी चाहिए। नफरी बहुत कम है। सुनो सरकार, ट्रैफिक सुधार के लिए विशेष बजट पुलिस महकमे को उपलब्ध कराया जाएगा तो वो साधन जुटा लेंगे। पुलिसकर्मी दे दिए जाएं तो इस शहर का भी ट्रैफिक चंडीगढ़ की तरह होना सम्भव है। सरकार दो दिन बीकानेर में है। इस समस्या के निदान की यदि उनसे अपेक्षा की जाती है तो वो गलत भी नहीं है।

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