वक्त के साथ नेताओं की दूरियां बढ़ती ही जा रही, अब दो की जगह बन गए तीन गुट
बीकानेर के कांग्रेसजनों का विवाद नजीर है पार्टी के लिए
भाजपा की देरी की रणनीति कर रही है काम
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Network.
राज्य में पिछली सरकार कांग्रेस की थी और उसके मुखिया अशोक गहलोत थे। उस सरकार को बनने में समय लगा था, जिस पर विपक्षी भाजपा ने तंज भी किये थे। दरअसल, उस समय सरकार के नेतृत्त्व को लेकर अशोक गहलोत व सचिन पायलट के मध्य टकराहट थी। चुनाव में पार्टी अध्यक्ष पायलट थे और नेता प्रतिपक्ष स्व रामेश्वर डूडी थे। उन्होंने 22 विधायक होते हुए भी सरकार से संघर्ष किया। आखिरकार चुनाव में सरकार आई।

तब मुख्यमंत्री का दावा अशोक गहलोत ने भी रख दिया, सचिन दावेदार थे ही। दोनों के मध्य टकराहट थी, जिसे दूर करने में पार्टी आलाकमान को काफी दिन लगे। नेतृत्त्व करने के दोनों के अपने अपने तर्क थे। देश की राजनीति में कांग्रेस कमजोर हो चुकी थी और भाजपा ताकतवर थी।
कम ही जगह थी जहाँ कांग्रेस सरकार की स्थिति में थी। इस कारण आपसी टकराहट के चलते वो राजस्थान को खोना नहीं चाहती थी। गहलोत व पायलट की टकराहट में निर्णय में काफी देरी हुई। आखिरकार फैसला अशोक गहलोत के पक्ष में हुआ।

गहलोत सीएम बने और पायलट डिप्टी सीएम व साथ में पीसीसी अध्यक्ष भी। पायलट को ग्रामीण विकास व पीडब्ल्यूडी मंत्रालय मिले। सरकार बन गयी मगर कसक रह गयी।
आखिर कोरोना के समय गहलोत व पायलट आमने सामने हो गए। कांग्रेस व उसके विधायक दो धड़ों में बंट गए। खुलकर विरोध हुआ। मानेसर की घटना हुई और पायलट व उनके साथियो को मंत्री पद गंवाना पड़ा। गुटबाजी की खाई तब चौड़ी हो गयी। वह दूरियां अब भी बरकरार है। क्योंकि जबरदस्त जुबानी जंग हुई थी। तीखे बाण पायलट को झेलने पड़े थे।
वक्त ने दूरियों को बढ़ाया:
मंत्री पद से हटने के बाद भी सचिन पायलट ने अपना पक्ष नहीं बदला और आलाकमान से पक्ष सुनने का आग्रह किया। जबकि पायलट के विरोधी खेमे के लोग यह आरोप लगाते रहे कि वे भाजपा में जाने की तैयारी कर रहे है। वो झूठ निकला, वे आज भी कांग्रेस के केंद्रीय संगठन की एक मजबूत कड़ी है और देश भर में पार्टी के स्टार प्रचारक है। एआईसीसी के महासचिव व छत्तीसगढ़ के प्रभारी है।

आलाकमान ने कुछ सचिन समर्थकों हेमाराम चौधरी, मुरारीलाल मीणा को मंत्री बनाया। उनको सीडब्ल्यूसी सदस्य बनाया। क्षतिपूर्ति की कोशिश हुई। फिर एक राजनीतिक घटना हुई जिसने गहलोत पर असर डाला, आलाकमान पर उनकी पकड़ कमजोर हुई। बाद में पार्टी ने कुछ बदलने का निर्णय किया और विधायक दल की बैठक बुलाई। अभी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व अजय माकन को पर्यवेक्षक बनाकर जयपुर भेजा गया। मगर वे सीएम हाउस में इंतजार करते रहे और गहलोत समर्थक विधायक आलाकमान की अवहेलना कर विधानसभा अध्यक्ष के यहां पहुंचे और अपने इस्तीफे यह कहते हुए सौंप दिए कि यदि सीएम गहलोत को बदला जायेगा तो इन इस्तीफों को स्वीकार कर लिया जाये। यह आलाकमान को खुली चुनोती थी। हालांकि विधायकों के इस व्यवहार पर गहलोत ने माफी भी मांगी मगर वो फांस आज तक अटकी हुई है।
एक नया गुट हुआ उदय:
इस टकराहट के मध्य पीसीसी अध्यक्ष गोविंद डोटासरा को बना दिया गया। डोटासरा ने लोकसभा चुनाव में जबरदस्त मेहनत की और पायलट से भी दूरियां कम की, पहले उनको गहलोत के गुट का माना जाता था। डोटासरा के अंदाज व आक्रामक तेवर से उनकी भी एक टीम अलग से खड़ी हो गयी। उसका उदाहरण नये बने जिलाध्यक्षों में देखा जा सकता है। अब तीन खेमे साफ साफ नजर आ रहे है, पहला गहलोत का, दूसरा पायलट का और तीसरा डोटासरा का।

गुटबाजी का पड़ेगा प्रभाव:
कांग्रेस के इन तीन खेमों का पंचायत राज चुनाव व स्थानीय निकाय चुनाव में पूरा असर पड़ना तय सा लगता है। हर खेमा अपने लोगों को उम्मीदवार बनवाने और जितवाने की कोशिश करेगा। वर्चस्व की लड़ाई पार्टी के भीतर ही खड़ी हो जायेगी।

इस गुटबाजी का फायदा भाजपा को मिलेगा। भाजपा इन चुनावों को कराने में जो समय ले रही है, वो उसके लिए लाभदायी साबित हो रहा है। क्योंकि कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी धीरे धीरे बढ़ भी रही है।
बीकानेर की घटना नजीर:
बीकानेर के पंचायत राज चुनाव में सदैव कांग्रेस का ही दबदबा रहा है। किसान नेता स्व रामेश्वर डूडी के हाथ मे 25 साल से कमान है। उनके निधन के बाद अब एक ऑडियो और वीडियो ने डूडी समर्थकों व पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल को आमने सामने कर दिया है। खुलकर एक दूसरे पर आरोप लग रहे है। प्रदेश नेतृत्त्व की चुप्पी की वजह भी गुटबाजी ही है। दोनों ही गुट प्रदेश के दो बड़े नेताओं से जुड़े हुए है। इस टकराहट का फायदा केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को व भाजपा को मिलेगा।

बात दिल्ली तक पहुंची:
बीकानेर का गुटबाजी का यह प्रकरण जयपुर होते हुए दिल्ली तक पहुंच चुका है। राहुल गांधी के दखल के बिना अब हल निकलता प्रतीत नहीं होता। पर हल क्या होगा, ये यक्ष प्रश्न है।


