दिल्ली, बंगाल, तमिलनाडु के बाद केरलम में सख्त रवैया, राजस्थान के नेता हुए सतर्क
आलाकमान से टकराहट अब सहन नहीं की जायेगी
भाजपा के प्रति सॉफ्ट रहने वाले हाशिये पर
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
कांग्रेस ने जब अपना संगठन सृजन अभियान शुरू किया तो उसे पार्टी के ही पुराने नेताओं व अन्यों ने गंभीरता से नहीं लिया। पुराने नेताओं ने यह सोचा भी नहीं था कि उनकी मर्जी के बिना उनके जिलों में संगठन के मुखिया बन सकेंगे। वे अनोपचारिक बातचीत में कहा भी करते थे कि नियम कहने के लिए होते है, मगर नियम बड़े नेताओं के लिए तोड़े भी जाते है। उनकी बात असत्य नहीं थी, क्योंकि अब तक का तो उनका अनुभव यही था।

उनको क्या पता था कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ये मान चुके थे कि पार्टी की निरंतर हार की वजह कमजोर संगठन का होना है। भाजपा की तर्ज पर कांग्रेस के संगठन को मजबूत बनाने के लिए ही राहुल ने संगठन सृजन अभियान आरम्भ किया। दूसरे राज्यों के पर्यवेक्षक लगाकर सबसे प्राथमिक इकाई जिलाध्यक्ष का चुनाव किया।
उस चुनाव से ही बड़े नेताओं की आंख खुल गयी। क्योंकि उनकी मनमर्जी को तरजीह नहीं मिली, सलाह का सम्मान किया गया। फिर इन जिलाध्यक्षों की क्लास पहले के सी वेणुगोपाल और फिर खुद राहुल गांधी ने ली। स्पष्ट कर दिया गया कि अब टिकट चयन में जिलाध्यक्ष की महत्ती भूमिका रहेगी। जिलाध्यक्ष सीधे राहुल गांधी के संपर्क में रहेंगे। यह दूसरा बड़ा झटका था मठाधीश बने बैठे नेताओं के लिए। कांग्रेस आलाकमान अब सख्त हो रहा है, यह कुछ समझदार नेता तो समझ गए। जो नहीं समझे, वे अब धीरे धीरे हाशिये पर जाने लगे है।
राजस्थान के नेता सतर्क हुए:
इस बार कांग्रेस ने ढिलाई नहीं बरती। दिल्ली में जैसे ही आप ने सीट समझौता नहीं किया, बंगाल में जैसे ही ममता ने कहा कि अकेले चुनाव लड़ेंगे, राहुल ने निर्णय में देरी नहीं लगाई। दोनों जगह सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे और दमखम से चुनाव लड़ा, परिणाम आप व टीएमसी को पता है। अहसास भी है और गलती का भान भी।
तमिलनाडु में भी वहां के संगठन से बात न करके सीधे विजय को समर्थन दिया। ये एक तरफ जहां स्टालिन को संदेश था वहीं तमिलनाडु के कांग्रेस नेताओं को भी घुड़की थी। द्रमुक ने साथ रखने के बाद सरकार में शामिल नहीं किया। 2013 में अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। उसका सख्त जवाब राहुल ने अब दिया।

केरलम में वी सतीशन ने 5 साल वहां की सरकार के खिलाफ संघर्ष किया। इस बार चुनाव जिताया तो उन्हीं को सीएम बनाने का निर्णय किया। के सी वेणुगोपाल या रमेश चेन्नीथला को नहीं। यह संदेश सभी राज्यों के नेताओं को है कि जो 5 साल विपक्ष में मेहनत करेगा, सत्ता आने पर उसे ही कमान मिलेगी।

राजस्थान की स्थितियां भी संगठन को लेकर अच्छी नहीं थी। पिछली सरकार के समय की घटना पार्टी को पता है, जब पर्यवेक्षक खड़गे व माकन बैठे रहे और विधायक बुलाई गयी बैठक में भी नहीं आये। यही नही , अपने इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष को यह कहते हुए सौंप दिए कि यदि अशोक गहलोत को सीएम हटाया जाता है तो हमारे इस्तीफे स्वीकार कर लिए जाये। वरिष्ठ पर बड़बोले विधायक शांति धारीवाल तो यहां तक बोल गए कि राजस्थान में तो आलाकमान गहलोत है। आखिरकार, विधायकों के व्यवहार पर गहलोत को दिल्ली जाकर सोनिया गांधी के सामने खेद जताना पड़ा। अब ऐसा नहीं होगा, इस तरह का सख्त संदेश राज्य के नेताओं को राहुल ने दिया है।

अनुशासनहीनता पर भी नजर:
राजस्थान में कांग्रेस की गुटबाजी अभी तक खत्म नहीं हुई है। इस पर भी आलाकमान की नजर है और उसने उन नेताओं से व्यवहार में बदलाव भी किया है। पिछले दिनों जब बारबार भाजपा पर हमला करते समय गहलोत ने मानेसर का जिक्र किया तो आलाकमान ने उसे गंभीरता से लिया। ठीक इसके विपरीत इस प्रकरण में सचिन पायलट ने संयमित जवाब दिया और टिप्पणी करने से बचे। अब पायलट आलाकमान के निकट है, वहीं अनेक नेताओं को दिल्ली में तरजीह मिलनी कम हुई है। आलाकमान कुछ भाजपा नेताओं पर दिए जाने वाले सॉफ्ट बयानों पर भी नजर रख रहा है। इस वजह से ही जिलाध्यक्षों तक को निर्देश दिये है कि जो भी भाजपा के प्रति सॉफ्ट है, उनको पदाधिकारी नहीं बनाया जाये। विश्राम दिया जाये।

आलाकमान टकराहट नहीं सहेगा:
आलाकमान ने अपने निर्णयों से साफ कह दिया है कि वो टकराहट सहन नहीं करेगा, चाहे कोई कितना भी बड़ा नेता क्यों न हो। दबाव नहीं चलेगा। आनंद शर्मा, कमलनाथ, शशि थरूर आदि इसके उदाहरण है। अब आलाकमान की नजर राजस्थान पर है। आने वाले समय में यहां भी कांग्रेस में बड़े बदलाव दिखने की पूरी संभावना है।

