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राज्यसभा चुनाव के बाद भाजपा में भी बदलाव के संकेत, कांग्रेस में बड़े उथल पुथल के आसार दिख रहे

राहुल के तेवर तीखे, झटके में बदलेंगे बहुत कुछ
दोनों दल बिछा रहे अगले चुनाव की बिसात
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Network.


राज्य की पूरी राजनीति भाजपा व कांग्रेस के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है। क्योंकि प्रदेश में तीसरी शक्ति के उदय की कोशिशें कभी भी सफल नहीं रही है। राज्य में एक परम्परा सी बन गयी है कि पांच साल भाजपा और फिर पांच साल कांग्रेस, फिर भाजपा और फिर कांग्रेस। हालांकि इस बार नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल आरएलपी को तीसरी ताकत के रूप में खड़ा करने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। अभी से उन्होंने चुनावी बिगुल फूंक रखा है। अब विधानसभा चुनाव आने तक क्या स्थिति बनती है, यह तो समय बतायेगा।
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पर इतना निश्चित है कि राज्य की राजनीति पूरी तरह से भाजपा व कांग्रेस की परिधि में अपना रूप बदल के सामने आती रहती है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में तो मोदी लहर के चलते राज्य की सभी 25 सीटों पर भाजपा जीतती रही। मगर पिछला लोकसभा चुनाव राज्य की तस्वीर को बदल गया। भाजपा की राज्य में सरकार थी, फिर भी वह केवल 14 सीट ही जीत सकी। 11 सीट इंडिया गठबन्धन ने उससे छीन ली। 9 कांग्रेस के सांसद बने। नागौर सीट कांग्रेस के सहयोग से आरएलपी के हनुमान बेनीवाल ने जीती। ठीक इसी तरह सीकर की सीट माकपा के अमराराम ने कांग्रेस के सहयोग से जीती।

उन चुनाव परिणामों के बाद से राज्य की राजनीतिक सूरत में एक बड़ा बदलाव आना शुरू हो गया। उससे पहले विधानसभा चुनाव में भी बड़ा उलटफेर हुआ। भाजपा के दिग्गज नेता, पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र राठौड़ व भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया विधानसभा चुनाव हार गए। उस हार से ही राज्य की राजनीतिक तस्वीर का बदलना आरम्भ हो गया। पहले राठौड़ व पूनिया को लोकसभा में उम्मीदवार बनाने की बात चली, मगर बात सिरे नहीं चढ़ पाई। फिर दोनों के नाम राज्यसभा के लिए चले मगर टिकट केवल सतीश पूनिया को मिल सका। राठौड़ वरिष्ठता के बाद भी पीछे रह गए।

यह राजनीतिक बदलाव का एक टर्निंग पॉइंट होगा, यह अब लगने लग गया है। क्योंकि मन के भीतर कुछ और बात को सहेज राठौड़ ने कहा कि राज्यसभा के लिए सतीश पूनिया व अलका गुर्जर उनसे ज्यादा योग्य है। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या वो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बन रहे हैं तो फ्लो में राठौड़ यह भी कह गए कि प्रदेशाध्यक्ष के लिए मैं अयोग्य हूं। यह जवाब राज्य की भाजपा की राजनीति में बड़े चेंज की तरफ ईशारा कर रहा है। 
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कांग्रेस में गहरी उथल पुथल:

दूसरी तरफ कांग्रेस में भी बड़ी और गहरी उथल पुथल के संकेत मिलने लग गए हैं। पूर्व सीएम अशोक गहलोत फिर से मानेसर कांड को बारबार उछाल रहे हैं। यहां तक कि आलाकमान पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। 

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जब यह बात चली कि सचिन पायलट को फिर से प्रदेशाध्यक्ष बनाया जा रहा है, तब से गहलोत  पायलट पर पुराने मामले को लेकर जबरदस्त हमला बोल रहे हैं। यहां तक कह रहे हैं कि हनारे विधायकों ने पायलट का विरोध किया था, आलाकमान का नहीं।
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वही सचिन भी गहलोत का पुराना प्रकरण जबरदस्त तरीके से उछाल रहे हैं। प्रदेश में पहली बार गहलोत को इस तरह के तीखे विरोध का सामना करना पड़ रहा है, इस कारण वे पायलट पर हमला बोलते हुए आलाकमान पर भी जल्दबाजी में बोल गए। गहलोत / पायलट की यह जुबानी जंग इस बात का संकेत है कि कांग्रेस भी प्रदेश में बड़े बदलाव की तरफ बढ़ रही है।

राहुल अब अलग तेवर में:

उस समय राजस्थान के गहलोत समर्थक विधायको ने भले ही पर्यवेक्षकों मल्लिकार्जुन खड़गे व अजय माकन को आंख दिखा ली। क्योंकि आलाकमान कमजोर था। अब राहुल परिपक्व है और उनके तेवर भी तीखे है। जिनसे लगता है राज्य कांग्रेस में वे कोई बड़ा एक्शन लेंगे। जिसकी स्क्रिप्ट भी लिखी जा चुकी है। जो दिग्गजों को धराशायी करेगी। अब जो अनुशासनहीनता हो रही है वो सहन नहीं होगी और बड़ा एक्शन होगा, यह आभाष राजनीतिक विश्लेषकों को हो रहा है। इस हालत में राज्य कांग्रेस की राजनीति में भी बदलाव तय है।

राज्यसभा  चुनाव की प्रक्रिया पूरी होते ही प्रदेश की भाजपा व कांग्रेस में बड़े बदलाव तय दिख रहे हैं।

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