डूडी के निधन के बाद बीकानेर जाट राजनीति की अगुवाई का नेता नहीं
डूडी गुट से सदा मधुर संबंध रहे है हनुमान के
पंचायत चुनाव से हो सकती है एंट्री
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
बीकानेर की ग्रामीण क्षेत्र की राजनीति में पिछले 25 साल से किसान नेता रामेश्वर डूडी का जबरदस्त राजनीतिक वर्चस्व रहा है। वे खुद एक बार बीकानेर संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे। दो बार जिला प्रमुख रहे। तीन बार उनके ही गुट से जिला प्रमुख बना। वे नोखा से विधायक व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। देहात कांग्रेस अध्यक्ष पद भी उनके ही गुट के लोगों के पास रहा।

दुर्भाग्य से इस दिग्गज किसान नेता का असामयिक निधन हो गया। पहले वे गम्भीर बीमार हुए और उस समय विधानसभा चुनाव आ गए। उनकी धर्मपत्नी सुशीला डूडी को पार्टी ने नोखा से चुनाव लड़ाया। वे चुनाव जीत भी गयी। देहात कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर भी डूडी के निकटस्थ बिसनाराम सियाग दूसरी बार मनोनीत हुए है।
बीकानेर में देहात का इलाका खासा महत्त्वपूर्ण है। इसमें विधानसभा की 5 सीटें है। 25 साल तक डूडी या उसका समर्थक जिला प्रमुख रहा है, तो इसी गुट की देहात में ज्यादा मजबूत पकड़ है। बीकानेर पंचायत राज में अर्से से कांग्रेस का ही तकडा वर्चस्व रहा है।
डूडी के निधन के बाद एक शून्यता:
किसान केशरी रामेश्वर डूडी के निधन के बाद बीकानेर की ग्रामीण राजनीति में एक तरह की शून्यता है। ऐसा कोई बड़ा जाट नेता नहीं जो पांचों विधानसभाओं में समान रूप से पकड़ रखता हो। सुशीला डूडी और बिसनाराम सियाग ने डूडी समर्थकों को जोड़े रखने के प्रयास किये और अब भी कर रहे है, मगर डूडी की तरह पूरी पकड़ वाली बात अभी तक बनी नहीं।

हालांकि, लूणकरणसर में वीरेंद्र बेनीवाल व राजेन्द्र मूंड, श्रीडूंगरगढ़ में मंगलाराम गौदारा जैसे बड़े जाट नेता है। मगर इन्होंने कभी भी अपनी विधानसभा से बाहर जाट या किसान समाज से पूरा जुड़ाव नहीं रखा। जिले के जाट या किसान नेता वे बन नहीं पाए। दूसरे, जब अभी डूडी गुट व गोविंद मेघवाल में टकराहट हुई तो बेनीवाल व मंगलाराम की चुप्पी भी जाट समाज को खटकी है।

स्व रामेश्वर डूडी की अनुपस्थिति का बड़ा खमियाजा कांग्रेस को बीकानेर में उठाना पड़ेगा। विधानसभा चुनाव में उठाना भी पड़ा था। पंचायत राज की तो पूरी धुरी ही डूडी थे। वैसा नेता हाल फिलहाल तो कांग्रेस में कोई नजर नहीं आ रहा। कुल मिलाकर डूडी के बाद जाट नेता के रूप में किसी दूसरे की पहचान नहीं बन पाई है।
डूडी गुट V/S गोविंद की टकराहट भी एक वजह:
पिछले दिनों स्व रामेश्वर डूडी गुट व गोविंद मेघवाल आमने - सामने टकरा गए। टकराहट में प्रदर्शन हुए। सोशल मीडिया वार हुआ। बात पीसीसी व आलाकमान तक पहुंची। टकराहट अब भी कायम है, खमियाजा कांग्रेस को पंचायत चुनाव में उठाना पड़ेगा, यह साफ दिख रहा है।

हनुमान बेनीवाल की एंट्री:
यूं तो रालोपा सुप्रीमो व नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल पिछले चुनाव में ही बीकानेर में एंट्री कर चुके थे। उनके साथ लूणकरणसर में विजयपाल, कोलायत में प्रभुराम व श्रीडूंगरगढ़ में विवेक माचरा है। रालोपा ने पिछली बार उम्मीदवार भी उतारे। कोलायत में मंत्री भंवर सिंह भाटी के सामने रेवंतराम पंवार को उतारा और वे कांग्रेस की हार का बड़ा कारण बने।

हनुमान बेनीवाल व स्व रामेश्वर डूडी के सम्बंध गहरे थे, पारिवारिक थे। जब डूडी बीमार थे तब भी बीकानेर हनुमान आये। उनके निधन पर दाह संस्कार में आये। बाद में फिर आये। हनुमान व डूडी के भावुक सम्बंध थे। इस कारण इस बार के पंचायत चुनाव से बीकानेर में हनुमान बेनीवाल की एंट्री तय मानी जा रही है। अपनी पार्टी के स्थापना दिवस पर भी उन्होंने बीकानेर में ही बड़ी सभा की। यहां की जाट राजनीति का एक नेता भी नहीं है। डूडी गुट व गोविंद की टकराहट भी है। इन राजनीतिक स्थितियों में हनुमान बेनीवाल की एंट्री की पूरी संभावना है और अवसर भी है।

पंचायत चुनाव करेगा तस्वीर साफ:
बीकानेर की जाट राजनीति की कमान किसके पास रहेगी, इसका निर्धारण पंचायत राज चुनाव में हो जाना है। उस समय जो भावभूमि तैयार होगी, उस पर ही विधानसभा चुनाव की नींव खड़ी होगी। लेकिन यह निश्चित माना जा रहा है कि बीकानेर की राजनीति में अब हनुमान बेनीवाल का भी दखल रहेगा।

