Bikaner Mayor : मेयर की कुर्सी पर घमासान, कांग्रेस की बगावत और भाजपा की अंदरूनी खींचतान
कांग्रेस कैसे मनायेगी बागी बने नवरतन डागा को, भाजपा पार्षद दल के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं
बीकानेर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला। 80 में से 42 सीटें जीती है कांग्रेस ने। सीधी बात करें तो मेयर कांग्रेस का बनना तय है। मगर भाजपा ने पिछले एक दशक में जिस तरह से ऑपरेशन लोटस के जरिये बहुमत को भी अल्पमत में बदला है, उसे देखते हुए अब बहुमत सफल हो, यह सोचना पूरी तरह से सही नहीं है। बीकानेर नगर निगम में भी भाजपा ने बाजी पूरी तरह से पलटने में जुट गई है।
मधु आचार्य ' आशावादी '
मेयर चुनाव को लेकर बीकानेर में रोचक स्थिति बन गयी है। कांग्रेस में वार्ड 50 के पार्षद नवरतन डागा ने बगावत कर पर्चा दाखिल कर दिया। उन्होंने दो पर्चे दाखिल किए हैं, एक कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में तो दूसरा निर्दलीय के रूप में। जाहिर है, कांग्रेस से उनको सिंबल मिलना नहीं है, इस सूरत में एक नामांकन तो खारिज होना तय है। इस सूरत में निर्दलीय का नामांकन बना रहे, यह सावधानी बरती गई है।
डागा के पर्चे और बयानों ने कांग्रेस की परेशानी को बढ़ाया है, मगर पिछले 5 दशक से कल्ला परिवार भी राजनीति का सिरमौर रहा है, वो यूँ हथियार डालने वालों में नहीं है। बगावत थामकर बाजी अपने पक्ष में बनाये रखने के लिए दिग्गज नेता डॉ बी डी कल्ला ने भी उसी समय से बिसात बिछानी आरम्भ कर दी।

वहीं भाजपा प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह शेखावत भी छात्र राजनीति से सक्रिय हैं, तो वे भी बाहरी तौर पर खुद को आश्वस्त दिखा रहे हैं। मगर जितना आत्मविश्वास दिखा रहे हैं, उतना क्या भीतर बहुमत है, यह तो पत्ते खुलने पर ही सामने आयेगा। क्योंकि भाजपा पार्षद दल के भीतर भी छन छन कर यह बातें बाहर आ रही है कि वहां भी सब कुछ ठीक नहीं है। अब चूंकि भाजपा राज्य में शासन में है इस कारण वह असंतोष सार्वजनिक करने से असंतुष्ट पार्षद बच रहे हैं। दोनों धड़ों में अंदरखाने सब ठीक नहीं, यह बात तो कुछ हद तक सही है। बिना आग धुंआ नहीं उठता।
डागा की बात, मेघवाल की प्रतिष्ठा :
कांग्रेस से बागी बन परिवारवाद का घिसा हुआ आरोप लगाने वाले नवरतन डागा वार्ड 50 से पार्षद है, जिस वार्ड का टिकट बड़ा विवादास्पद रहा और उसकी पूरे देश में गूंज रही। डागा को टिकट देने के विरोध स्वरूप शहर कांग्रेस अध्यक्ष मदन मेघवाल को पिटाई भी झेलनी पड़ी। उस समय पूरी प्रदेश कांग्रेस उनके साथ खड़ी हुईं। यहां तक कि घटना के तुरन्त बाद मेघवाल के पक्ष में वाले पहले नेता डॉ बी डी कल्ला थे। अब उसी वार्ड के पार्षद ने कल्ला के खिलाफ बगावत की है, उन पर परिवारवाद का आरोप लगाया है।

अब इस कांग्रेस पार्षद की बगावत शहर अध्यक्ष मेघवाल की प्रतिष्ठा से जुड़ गई है, क्योंकि यह टिकट उन्हीं के खाते का है। डॉ कल्ला मंझे हुए राजनेता है इसी वजह से जब उनसे डागा की बगावत पर सवाल किया गया तो उन्होंने साफ कह दिया कि उनको अध्यक्ष जी मना लेंगे। यह कहकर उन्होंने गेंद शहर अध्यक्ष मदन मेघवाल के पाले में गेंद डाल दी है। परिणाम के बाद यह बयान नये राजनीतिक सवाल जवाब खड़े करेगा, जो संगठन के चुनाव के समय अधूरे रह गए थे।

बगावत से सतर्क थी कांग्रेस :
कांग्रेस बगावत से सतर्क नहीं थी, ऐसी बात भी नहीं है। उसे भीतर से विद्रोह का अंदाजा था इसी कारण उसने निर्दलीय पार्षदों की व्यवस्था पहले से ही की। डॉ कल्ला को प्रदेश कांग्रेस की तरफ से फ्री हैंड यूँ ही नहीं मिला था और कल्ला ने भी यूँ ही इतना बड़ा राजनीतिक कदम नहीं उठाया था।
भाजपा पार्षद दल के भीतर भी कुछ चल रहा है :
पार्षदों के चुनाव परिणाम आने से पहले भाजपा के लिए जो बड़े नेता सक्रिय थे वे अब नहीं दिख रहे। उनकी जगह दूसरे नेताओं ने ले ली है। उससे स्पष्ट है कि वहां भी भीतर सब कुछ ठीक नहीं। सुरेंद्र सिंह शेखावत को भाजपा ने यूँ ही प्रत्याशी नहीं बनाया है, उनकी क्षमताओं व अन्य दलों के नेताओं से उनके संपर्क को ध्यान में रखा गया है ताकि कुछ उलटफेर हो सके। बस, भाजपा को भीतर की टकराहट को रोकना जरूरी है।
दोनों तरफ गड़बड़, कांग्रेस फिर भी अपर हैंड :
कांग्रेस और भाजपा पार्षद दल, दोनों के भीतर कुछ कुछ गड़बड़ है। यह तो ध्वनियां बाहर तक आ गयी है। मगर इसके बाद भी कांग्रेस को अपर हैंड माना जाना चाहिए क्योंकि उसके कुल पार्षद 42 है और भाजपा के केवल 27। भाजपा को 14 पार्षदों की व्यवस्था करनी है, जो इतना आसान काम नहीं। वो भी उस हालत में जब कुछ निर्दलीय कांग्रेस के पास भी है। कुल मिलाकर पार्टियों के भीतर के असंतोष ने मेयर के चुनाव को रोचक बना दिया है।

