कांग्रेस विपक्षी मतों के विभाजन को रोकने में लगी, कांग्रेस सहित 6 दल मिलकर लड़ रहे चुनाव
प्रियंका की बड़ी राजनीतिक परीक्षा
अभिषेक आचार्य

RNE Special.
असम में चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के बाद राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गयी है। भाजपा व कांग्रेस के मध्य यहां मुख्य मुकाबला है और इस बार कांटे की टक्कर है। पिछले दो चुनावों की तरह एक पक्ष ज्यादा भारी नजर नहीं आ रहा। इस बार टक्कर संतुलित दिख रही है।

एक समय में पूर्वोत्तर के इस राज्य में कांग्रेस का एकतरफा वर्चस्व था। बाद में यह प्रदेश आतंकवाद की चपेट में आ गया। यहां हुए छात्र आंदोलन ने कांग्रेस की चूलें पूरी तरह से हिला दी। तरुण गोगोई तक कांग्रेस यहां प्रभावी रही, बाद में उसका जनाधार खिसकता रहा।

भाजपा का यहां कुछ भी प्रभुत्व नहीं था। भाजपा इस राज्य में असम गण परिषद के माध्यम से प्रविष्ट हुई। फिर उसने कांग्रेस को तोड़ा और उनके नेताओं के बूते राज्य में भाजपा की सरकार बनाई। अभी के भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री हेमंत बिसवा सरमा एक समय में कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता थे। आज वे ही असम में भाजपा के खेवनहार है। एक समय में हेमंत बिसवा भाजपा को सांप्रदायिक राजनीतिक दल बताते थे और आज उसी भाजपा की नीतियों पर चुनाव लड़ रहे है।
ध्रुवीकरण की कोशिश बिसवा की:
असम में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री हेमंत बिसवा सरमा पूरी तरह से ध्रुवीकरण करके इस चुनाव में सफलता पाना चाहते है। उन्होंने दो साल पहले से ही इसके प्रयास आरम्भ कर दिए। अनेक जिलों के नाम बदले गए। स्थानों के नाम बदले गए।

हेमंत बिसवा कांग्रेस की तरफ से सीएम फेस व लोकसभा में उप नेता प्रतिपक्ष गौरव गोगोई व उनकी पत्नी पर पाकिस्तान से प्रेम के आरोप भी लगातार जड़ कर एक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे है। मुस्लिम विवाह के रजिस्ट्रेशन का नया कानून आदि प्रयास ध्रुवीकरण के ही है। भाजपा असम में इसको ही चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में है। अब यह मुद्दा कितना लाभ देता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।
विपक्ष की एकजुटता:
इस बार विपक्षी मतों के विभाजन को रोकने के लिए कांग्रेस ने खास प्रयास किये है। असम के सभी प्रमुख क्षेत्रीय दलों को एक किया है। कांग्रेस ने 6 दलों के साथ गठबन्धन किया है और खुद 100 सीट पर ही चुनाव लड़ रही है।

अपने तमाम अहंकार को भुलाकर गौरव गोगोई क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवारों के नामांकन दाखिल कराने के लिए भी जा रहे है। गौरव को अपने पिता तरुण गोगोई की विरासत का भी लाभ मिल रहा है। उनकी असम में मजबूत पकड़ थी और वर्चस्व भी था।
भाजपा लगा रही कांग्रेस में सेंध:
भाजपा ने इस बार भी चुनाव से पहले कांग्रेस में सेंधमारी का काम किया है। कांग्रेस के असम प्रदेश अध्यक्ष तक को तोड़कर अपने साथ ले आये। जबकि उनकी पूरी विरासत कांग्रेस की है।
चुनाव की तारीखों का ऐलान से पहले असम से कांग्रेस सांसद प्रद्युत को भी भाजपा तोड़कर अपने पाले में ले आयी।

प्रधुत कांग्रेस सांसद थे और पार्टी ने उनके पुत्र को पहली सूची में विधानसभा का टिकट दिया था। मगर प्रद्युत भाजपा में आ गए और अब भाजपा के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ रहे है। वहीं उनके पुत्र ने भी अब कांग्रेस का विधानसभा का टिकट वापस लौटा दिया है। भाजपा लगातार कांग्रेस में सेंधमारी की कोशिश कर रही है।
प्रियंका की बड़ी परीक्षा:
कांग्रेस ने इस बार असम विधानसभा चुनाव की जिम्मेवारी महासचिव व वायनाड सांसद प्रियंका गांधी को दी है। उनके साथ कर्नाटक के डिप्टी सीएम डी के शिवकुमार को लगाया है। प्रियंका के लिए यह चुनाव बड़ी राजनीतिक परीक्षा है।

प्रियंका का असम में एक क्रेज भी है, उस छवि को कांग्रेस भुनाने का पूरा प्रयास कर रही है। असम चुनाव इस बार भाजपा के लिए आसान नहीं है। कांग्रेस यदि विपक्ष के मतों का विभाजन रोकने में सफल रही तो भाजपा के सामने मुश्किलें खड़ी होगी।

