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कहीं चुनाव में देरी कर खुद ही तो गोल नहीं कर लिया, कांग्रेस ज्यादा जोश में, होश तो नहीं गंवा रही

निकायों में कांग्रेस की पार पड़नी उतनी आसान नहीं
भाजपा को पंचायत राज दिखायेगा आईना
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.
 

अब तो माननीय न्यायालय ने भी कह दिया है कि प्रदेश के स्थानीय निकायों व पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव कराएं जाएं , बहुत देरी हो गयी। राज्य सरकार इन चुनावों को जितना टाल सकती थी उतना टाल चुकी। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को लेकर भी अब तो कोर्ट ने साफ साफ कह दिया है कि जल्दी लो और चुनाव कराओ।
राज्य में भाजपा की सत्ता है। मुख्यमंत्री भजनलाल है और उनको पूरा फ्री हैंड है। फिर चुनाव क्यों नहीं कराए जा रहे, यह सोचने की बात है। स्थितियां भाजपा के लिए बेहतर थी, फिर भी पता नहीं किस रणनीति के तहत निकाय व पंचायत के चुनाव टाले गये।

मामला आखिरकार पूर्व विधायक संयम लोढ़ा कोर्ट में लेकर गये, तब जाकर सरकार के कान खड़े हुए। उसने हाथ पैर मारने आरम्भ किये । तब तक कांग्रेस इस देरी को पूरा मुद्दा बना चुकी है। अब यही एक मुद्दा चुनाव में भाजपा पर कहीं भारी न पड़ जाये।

भाजपा खुद तो गोल नहीं कर रही:

निकाय व पंचायत चुनाव में देरी करना कहीं भाजपा को ही भारी न पड़ जाए। सेल्फ गोल वाली स्थिति भी तो बन सकती है। जनता को ये लगेगा कि हार के डर से सरकार चुनाव नहीं करा रही है। पब्लिक में यही परसेप्शन भी कांग्रेस बनाने में सफल भी रही है। 

राजनीति परसेप्शन का ही खेल है। जो नैरेटिव एक बार सेट हो जाता है उसे बदलना बहुत ही मुश्किल होता है। अब कांग्रेस ने इस नैरेटिव को खड़ा कर दिया कि हार का डर भाजपा को सताने लगा है, इस वजह से ही वह बारबार चुनाव टाल रही है। इस नैरेटिव को तोड़ने में यदि भाजपा सफल नहीं रही तो उसे बहुत भारी पड़ेगा।

कांग्रेस जोश में होश तो नहीं गंवा रही:

वहीं कांग्रेस के साथ भी एक बडी दिक्कत है। वह पूरे जोश में दिख रही है। होना वाजिब भी है। क्योंकि भाजपा बैकफुट पर है। चुनाव में हो रही देरी के कारण वह हमलावर नहीं है, बैकफुट पर खेल रही है। कांग्रेस को उसने ही फ्रंटफुट पर खेलने का अपनी तरफ से निमंत्रण दे दिया है। यह मोरली कांग्रेस को मजबूत करने वाली बात हुई। 

कांग्रेस पूरे जोश में है, मगर उसने होश खो दिया तो जीत कभी भी हार में बदल सकती है। हरियाणा में कांग्रेस होश खोने के कारण ही तो जीत के निकट पहुंचकर हार गई थी। यहां भी थोड़ी सी चूक नुकसान पहुंचा सकती है। 

निकाय चुनाव वैसे भी आसान नहीं:

कांग्रेस के लिए निकाय चुनाव वैसे भी आसान नहीं है। क्योंकि शहरी वोटर सदैव भाजपा का साथ देता नजर आता है। इस स्थिति में शहरी निकाय में ज्यादा उम्मीद करने से कांग्रेस को निराशा ही हाथ लगेगी। हां, जहां जहां भाजपा में गुटबाजी है वहां वहां कांग्रेस कुछ उम्मीद कर सकती है। मगर इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस भी गहलोत, पायलट व डोटासरा गुटों में बंटी है। भाजपा में भी वसुंधरा गुट भी बराबरी की लड़ाई लड़ती है। उसका खमियाजा तो भाजपा को उठाना पड़ेगा।

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कांग्रेस में कुछ छोटे गुट भी है। बीकानेर में अब स्व रामेश्वर डूडी गुट व गोविंदराम मेघवाल गुट के बीच जबरदस्त खींचतान है। दोनों एक दूसरे को पछाड़ने के लिए पूरा दम लगाएंगे, जिसका फायदा भाजपा को मिलना तय है।

पंचायत राज भाजपा के लिए टेढ़ी खीर:

राज्य में पंचायत राज चुनाव भाजपा के लिए टेढ़ी खीर है। अरसे से इन चुनावों में कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। भाजपा सदा ग्रामीण इलाकों में कमजोर ही रहती है।

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