डोटासरा की संगठन महासचिव वेणुगोपाल से लंबी बैठक, राज्य कांग्रेस में बदलाव की बात ने फिर तूल पकड़ा
पायलट की खामोशी के भी राजनीतिक अर्थ
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
कांग्रेस ने पिछले दो नहीनों से राजस्थान को लेकर विशेष चर्चा चल रही है। राहुल गांधी के भी इस बीच राज्य के दो दौरे हो चुके हैं। पहली बार वे राजस्थान व दिल्ली के जिलाध्यक्षों के प्रशिक्षण में पुष्कर आये थे। उसके बाद वे 17 जून को राष्ट्रव्यापी ' छात्रों की गूंज ' कार्यक्रम को आरम्भ करने के लिए कोटा आये और उन्होंने छात्रों व युवाओं से सीधे बात की। नीट पेपर लीक के बाद से ही राहुल का छात्रों व युवाओं पर विशेष फोकस है।

राज्य के इन दोनों दौरों में राहुल की बॉडी लैंग्वेज व नेताओं से नजदीकियां व दूरियां अखबारों की सुर्खियां बनी। राहुल इस समय एक्शन मूड में है। यह उन्होंने केरलम व कर्नाटक में साबित किया। मगर इसके संकेत उन्होंने हरियाणा राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले 6 विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाकर दे दिया था। हरियाणा जैसे राज्य में अनुशासनहीनता पर इतना सख्त त्वरित एक्शन पहले कभी नहीं हुआ था।

संगठन सृजन अभियान के तहत राहुल व खड़गे ने अनेक राज्यों में नेतृत्त्व बदला और कई महत्त्वपूर्ण राज्यों के प्रभारी भी बदल दिए। सबसे बड़ा बदलाव उत्तर प्रदेश में किया गया। सख्त निर्णय लेते हुए राहुल ने अविनाश पांडे को प्रभारी हटा दिया और आप से आये दलित नेता राजेन्द्र गौतम को यूपी की कमान सौंपी। यूपी में अगले साल विधानसभा चुनाव भी होने हैं।

राहुल ने इसी तर्ज पर राजस्थान में भी बदलाव की स्क्रिप्ट तैयार की हुई है। उसकी भनक लगते ही पूर्व सीएम अशोक गहलोत सक्रिय हो गए और उन्होंने ताबड़तोड़ सचिन पायलट पर मानेसर को लेकर हमले शुरू कर दिए। उससे ही लग गया कि राज्य कांग्रेस में काफी कुछ बदल रहा है। यह बात उस समय प्रमाणित हो गयी जब गहलोत के हमलों पर पायलट चुप रहे, कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उलटे यह कहा कि मैं तो उनके पुत्र वैभव गहलोत जैसा हूं, वे भी मुझे यही मानते हैं। उसके बाद से गहलोत चुप है। आलाकमान की तरफ से भी कुछ कह दिया गया होगा शायद। सचिन के समर्थक तो गहलोत के बयान पर बोले, मगर गहलोत का एक भी समर्थक उनके पक्ष में नहीं बोला। फिर राज्यसभा चुनाव आ गए तो बदलाव की बात ठंडी पड़ गयी। अब फिर से वही कवायद आरम्भ हो गयी है।
डोटासरा का दिल्ली दौरा:
पांच दिन पहले अचानक से पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा को आलाकमान ने दिल्ली बुलाया। वे अकेले ही दिल्ली गए। न तो नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जुली और न ही प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा दिल्ली में थे। रंधावा तो अब वैसे ही पंजाब की राजनीति में उलझे हुए हैं। बदलाव की चर्चाओं के मध्य डोटासरा को दिल्ली बुलाया गया।

डोटासरा से पार्टी के संगठन महासचिव के सी वेणुगोपाल ने मीटिंग की। सब जानते हैं, इस समय राहुल व खड़गे के निर्णयों की क्रियान्विति वेणुगोपाल ही करते हैं। वे सबसे भरोसे के आदमी है। डोटासरा को बिना किसी बड़ी बैठक के बुलाना और बात करना, यह तो तय है कि राजस्थान में ही कुछ होने वाला है। उसके लिए ही डोटासरा से कोई बात की गई है।
डोटासरा के काम से आलाकमान व राहुल गांधी प्रभावित है, यह बात वे सार्वजनिक रूप से कह भी चुके हैं। इस कारण राजस्थान में किसी भी तरह के निर्णय लेने से पहले डोटासरा से भी चर्चा की संभावना है। कयास यह लगाया जा रहा है कि संगठन की बातों पर ही डोटासरा व वेणुगोपाल के मध्य चर्चा हुई है।

राजनीतिक क्षेत्र में एक चर्चा और कयास और भी है। डोटासरा के काम से आलाकमान खुश हैं, इस कारण वो उनको बड़ी जिम्मेदारी भी दे सकता है। उसकी स्क्रिप्ट भी दो माह पहले लिख ली गयी है। अब तो उसको क्रियान्वित करने की प्रक्रिया चल रही है। डोटासरा व वेणुगोपाल के बीच क्या बात हुई, यह उजागर नहीं हुआ है। इस सांगठनिक चर्चा की बैठक कहा गया है। मगर यह तय है कि डोटासरा का यह दिल्ली दौरा कुछ तो खास है। इस दौरे से राज्य कांग्रेस में बदलाव की बात ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है।
गहलोत के दो दिल्ली दौरे:
काफी लंबे समय बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का पहला दिल्ली दौरा हुआ। उस समय राजीव गांधी ट्रस्ट की बैठक हुई। उस बैठक में सोनिया गांधी ने ट्रस्ट के सभी सदस्यों को बुलाया था। जिनमें गहलोत के अलावा जनार्दन द्विवेदी भी थे। वह बैठक तो पूरी तरह से कांग्रेस के ट्रस्ट तक सीमित थी। यह बात बाद में गहलोत ने मीडिया से भी कही कि बैठक में ट्रस्ट को लेकर चर्चा हुई, कोई सांगठनिक बात नहीं हुई।

गहलोत का दूसरा दिल्ली दौरा कल मंगलवार को हुआ। 24 अकबर रोड स्थित पार्टी कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस गहलोत ने की। यह कॉन्फ्रेंस राम मंदिर चढ़ावा गबन को लेकर थी। इस मुद्दे पर गहलोत ने भाजपा को कटघरे में खड़ा किया। गहलोत की आरंभिक बात के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि 24 अकबर रोड की बात ही कुछ और हैं। यह कांग्रेस का पुराना कार्यालय है, नया कार्यालय तो इंदिरा भवन है। आजकल सभी गतिविधियां वहीं होती है, गहलोत की पीसी 24 अकबर रोड पर थी। गहलोत के इन दो दिल्ली दौरों के भी राजनीतिक मायने बदलाव को लेकर निकाले जा रहे हैं। समय ही अब इस सस्पेंस पर से पर्दा उठाएगा।
पायलट की खामोशी के अर्थ:

इतनी राजनीतिक उथल पुथल के बीच भी सचिन पायलट चुप है। कुछ भी नहीं बोल रहे। आलाकमान ने उनको छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया हुआ है, वे वहीं सक्रिय है। बीच बीच में दिल्ली व राजस्थान भी आते हैं मगर कुछ भी बोलने से बचते हैं। उनके निशाने पर केंद्र सरकार , राज्य सरकार व भाजपा रहते हैं। वे कांग्रेस की राज्य की खींचतान पर किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं करते। उनकी यह कार्यशैली भी इस बात का संकेत है कि राज्य कांग्रेस में कुछ न कुछ तो बड़ा बदलाव हो रहा है।

