क्या गहलोत आ गए हैं राज्य कांग्रेस के टारगेट पर, कहीं यह आलाकमान के व्यवहार को देख के तो नहीं हो रहा
बदल रही है राज्य में कांग्रेस की सूरत और सीरत
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में इन दिनों उबाल आया हुआ है। आलाकमान व राज्य के बड़े नेताओं के बारबार पानी के छींटे मारने के बाद भी यह उबाल ठंडा नहीं हो रहा है। कांग्रेस को गुटबाजी के कारण ही पिछले विधानसभा चुनाव में अनुकूल परिणाम नहीं मिल सके थे। अशोक गहलोत व सचिन पायलट की आपसी टकराहट का बड़ा असर विधानसभा चुनाव पर पड़ा था। आलाकमान समय पर इन दोनों नेताओं की बीच की दूरियां समाप्त करवाकर इनको एकजुट नहीं कर सका था।

उस समय दिग्गज नेता अशोक गहलोत को राज्य में पहली बार चुनोती मिली। नहीं तो इससे पहले गहलोत का राज्य कांग्रेस पर एकछत्र राज्य था। वे तीसरी बार मुख्यमंत्री भी बन गए थे। उनकी बराबरी कोई कांग्रेसी नेता नहीं कर पाता था। राज्य कांग्रेस में उनका पूरा वर्चस्व था।

उनके वर्चस्व को चुनोती सचिन पायलट ने पहली बार दी थी। उनकी चुनोती के बाद गुटबाजी खुलकर सामने आ गयी। गुटबाजी के चलते ही गहलोत ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के प्रस्ताव को नजरअंदाज किया और सीएम बने रहे। अपने समर्थकों के दबाव के चलते ही वे सीएम की कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हुए। उस घटना के बाद ही गहलोत और आलाकमान के मध्य दूरी बढ़ने लग गयी। क्योंकि कांग्रेस के इतिहास में पहली बार पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे व अजय माकन विधायक दल की बैठक बुला इंतजार करते रहे और गहलोत समर्थक बैठक में आये ही नहीं। खड़गे व माकन को जयपुर से बैरंग लौटना पड़ा। उस समय के स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल के बयान कि राजस्थान में तो गहलोत ही आलाकमान है, ने गहलोत के लिए बड़ी परेशानी पैदा की। तब से आलाकमान के साथ गहलोत का तालमेल बिगड़ गया, जो अब तो ज्यादा ही विषम हो गया है।
सचिन के बाद हरीश चौधरी का प्रहार:
पूर्व सीएम अशोक गहलोत को कांग्रेस के भीतर से पहली चुनोती सचिन पायलट से मिली। पायलट की कूटनीति के चलते पहली बार गहलोत को आलाकमान के सामने शिकस्त मिली। इन दोनों नेताओं के मध्य जो दरार पड़ी वह आज भी मिट नहीं पाई है, यह जग जाहिर बात है। आलाकमान उस समय कमजोर था इस कारण गहलोत की जगह राज्य सरकार की कमान वह पायलट को सौंप नहीं सका। जिसकी क्षतिपूर्ति आलाकमान ने उनको सीडब्ल्यूसी मेम्बर, कांग्रेस राष्ट्रीय महासचिव व छत्तीसगढ़ प्रभारी बनाकर की।

सचिन पायलट के बाद राज्य के जिस दूसरे कांग्रेस नेता ने गहलोत के खिलाफ जाकर उनको चुनोती दी, वे थार के दिग्गज नेता हरीश चौधरी थे। जो राहुल गांधी के भरोसेमंद साथियों की टीम के सदस्य हैं। एक समय में वे गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री थे, उनके खास थे, मगर फिर उनके विरोधी हो गए। हाल ही में उन्होंने गहलोत व अपने बीच की दूरी को सार्वजनिक बयान देकर जता दिया।

हरीश चौधरी ने कहा कि उनकी तो अब पूर्व सीएम से बात ही नहीं होती। काफी समय से कोई मुलाकात भी नहीं हुई। कोई उनके समाचार सुना देता है तो पता लग जाता है। उन्होंने यह कहकर बड़ा धमाका किया कि समय आने पर उनके और मेरे बीच की दूरी के कारण बताऊंगा। वे एक धार्मिक स्थल में बोल रहे थे और यह कहकर पूर्व सीएम पर प्रहार किया कि यहां मैं उनका नाम लेना भी सही नहीं मानता। गहलोत के सामने पायलट के बाद अब हरीश चौधरी भी खड़े दिखने लगे हैं।
अब गोविंद डोटासरा ने भी सुर वदले:
सचिन पायलट और हरीश चौधरी के बाद अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद डोटासरा के सुर भी गहलोत को लेकर बदल गए हैं। जबकि एक समय में पायलट को पीसीसी अध्यक्ष हटाने के बाद गहलोत के कहने पर उनके ही खास गोविंद डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई थी। गहलोत एक बार सार्वजनिक रूप से कह भी चुके हैं कि डोटासरा मेरे कारण पार्टी अध्यक्ष बने। इससे भी बड़ी बात यह है कि जब डोटासरा अध्यक्ष बने तो गहलोत के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद भी लिया।

समय बदला। कांग्रेस विपक्ष में आ गई और पार्टी की कमान डोटासरा के ही पास रही। अब एक लंबी अध्यक्षीय पारी के बाद डोटासरा का भी एक गुट राज्य में बन गया है। जिसकी भी सीधे चुनोती गहलोत को ही है, उनके नेताओं को ही है। डोटासरा ने हाल ही में गहलोत पर तीखा कटाक्ष कर राज्य की कांग्रेस की राजनीति में भूचाल ला दिया है।
मालवीय के बहाने गहलोत पर प्रहार:
पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा को पूर्व मंत्री व कांग्रेस से भाजपा तथा भाजपा से फिर कांग्रेस की यात्रा करने वाले बांसवाड़ा के नेता महेन्द्रजीत सिंह मालवीय के बहाने अशोक गहलोत पर प्रहार करने का बहाना मिला। मालवीय आरम्भ से ही गहलोत के ही विश्वसनीय रहे हैं और उनके मंत्रिमंडल में ताकतवर मंत्री थे। वे भाजपा की यात्रा करके वापस कांग्रेस में लौट आये हैं।

पिछले दिनों वे बांसवाड़ा से 300 से अधिक बाप कार्यकर्ताओं को जयपुर लाये। कहा गया कि ये कांग्रेस में शामिल होंगे। मालवीय इनको लेकर पीसीसी या डोटासरा के निवास पर ले जाने के बजाय सीधे गहलोत के आवास पर ले गए। जहां उन्होंने अशोक गहलोत के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के भी नारे लगा दिए।
डोटासरा इससे भड़क गए। ये बाद में पीसीसी आये। उस समय डोटासरा ने बीच में टोकते हुए माइक लिया और कहा कि मैं व्यक्तिपूजा में भरोसा नहीं करता। मेरे लिए कांग्रेस बड़ी है। यहां कोई भी मुख्यमंत्री वाला नारा न लगाए। याद रखना, मालवीय जी मेरी ही सिफारिश पर कांग्रेस में आये हैं। यह सीधे गहलोत पर तंज था कि मालवीय को गहलोत पार्टी में नहीं लाये।

डोटासरा के इस प्रहार पर पूर्व सीएम को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने कहा कि मेरे आवास पर कोई जॉइनिंग नहीं हुई। जॉइनिंग नेताओं की होती है, कार्यकर्ताओं की नहीं। डोटासरा जी के कहने को उन्होंने सही ठहराया। गहलोत ने तनाव कम करने की कोशिश की मगर गहलोत समर्थक प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष संदीप चौधरी ने ेरे गेरे नत्थुखेरे का बयान देकर मामला गर्म कर दिया। शांति धारीवाल ने फिर से यह कहकर कि मैं अपने उस बयान पर आज भी कायम हूं कि राजस्थान में आलाकमान गहलोत ही है। मगर इससे यह तो स्पष्ट हो ही गया कि अब डोटासरा भी गहलोत के सामने खड़े हैं।
क्या बदल रही है सूरत और सीरत:
एक एक करके पार्टी के नेताओं के टारगेट पर लगातार अशोक गहलोत आ रहे हैं। शायद आलाकमान से हुई गहलोत की दूरी ही इसके पीछे का कारण है। आलाकमान की तरफ से अब गहलोत को वह तव्वजो नहीं मिल रही जो पहले मिला करती थी, इस वजह से ही राज्य कांग्रेस के दूसरे बड़े नेताओं ने भी अपना व्यवहार बदलना शुरू कर दिया है। गहलोत भी तभी तो अपने वजूद की रक्षा के लिए इवेंट करते रहते हैं।

मगर तेजी से बदल रहे राज्य कांग्रेस के नेताओं के व्यवहार से यही लगता है कि राज्य में जल्दी ही कांग्रेस की सूरत और सीरत बदलने वाली है। इसमें गहलोत कहां होंगे और उनकी क्या भूमिका होगी, यह देखने की बात है।

