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कांग्रेस में केवल सचिन जीता सके अपने प्रभार का राज्य, अब केरल में सीएम चुनने के भी पर्यवेक्षक बने

आलाकमान की नजरों में बढ़ गया उनका कद
एक समय में खुद करते थे पर्यवेक्षक की प्रतीक्षा
बदलेगा राजस्थान का भी समीकरण
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.


राजनीति को सदा से अनिश्चितता का खेल माना गया है। समय कब पलटी मार दे और किसका राजयोग प्रबल हो जाये, यह कोई नहीं कह सकता। जो कल तक एक राजनीतिक कार्यकर्ता की पहुँच वाले होते है, वे कब सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाते है, कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
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हाल ही में तमिलनाडु में दक्षिण की फिल्मों के अभिनेता विजय थलापति वहां के सबसे बड़े राजनेता बनकर उभरे है और सीएम बनेंगे। जबकि उनकी राजनीतिक यात्रा केवल 800 दिनों की है और पार्टी केवल 2 साल पुरानी। 
 

आज केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा के एक समय में केवल दो लोकसभा सदस्य थे। अब वह 14 साल से केंद्र की सत्ता में है और 22 राज्यों में उसकी सरकार है। 27 साल तक लगातार बंगाल में राज करने वाले वाम दलों को इस बार केवल 2 विधानसभा सीट मिली है। पहले बंगाल, केरल, त्रिपुरा में शासन करते थे, आज कहीं भी सरकार नहीं है।

व्यक्तिगत बात करें तो एक समय ऐसा था जब राजस्थान में विधानसभा का चुनाव सचिन पायलट की अगुवाई में लड़ा गया, मगर वे सीएम नहीं बन सके। यहां तक कि उनको डिप्टी सीएम व प्रदेश अध्यक्ष पद से भी हटाया गया। समय ने फिर पलटी मारी, अब सचिन केरलम राज्य में सीएम चुनने के लिए विधायक दल की बैठक सीनियर प्रभारी के रूप में लेंगे। है ना, समय का अजब खेल।

केवल सचिन को  मिली सफलता:

विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के महासचिव व राज्य के पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट को आलाकमान ने केरलम का वरिष्ठ पर्यवेक्षक बनाया था। वहीं भंवर जितेंद्र सिंह को असम का जिम्मा मिला था।

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मगर पांच राज्यों में से कांग्रेस को केवल केरलम में ही सत्ता हासिल हुई और यहां का जिम्मा सचिन के पास था। केरलम कांग्रेस के लिए खास राज्य है। क्योंकि जब राहुल गांधी अमेठी से हार गए तब केरल के वायनाड ने ही उनकी साख बचाई थी। वो यहाँ से जीते थे। इस बार रायबरेली और वायनाड से जीते, वायनाड सीट खाली की। इस सीट से पहली बार प्रियंका गांधी चुनाव लड़ी और बड़े भारी अंतर से जीती। इस कारण केरलम गांधी परिवार के लिए खास था। यहां गांधी परिवार के लिए सबसे ज्यादा लोकप्रियता है, उसके यहां पायलट लोकप्रिय है।

10 जिलों में दौरे, 55 सभाएं:

गांधी परिवार की साख बचाने के लिए सचिन पायलट ने केरलम में पूरी ताकत झोंक दी। पायलट ने केरलम में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के लिए चुनावी रणनीति व प्रचार की कमान संभाली। उन्होंने केरलम के 14 में से 10 जिलों में दौरे कर 55 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में सभाएं, रोड शो और जनसंपर्क किया। टिकट वितरण में भी उनकी भागीदारी रही। उन्होंने प्रदेश से अमीन कागजी, मनीष यादव, रफीक खान, रिहाना रियाज और दानिश अबरार सहित कई नेताओं को प्रचार में लगाया। सचिन ने केरलम के अलावा असम व बंगाल में भी चुनाव प्रचार किया।  यहां पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने  प्रचार नहीं किया, एक एक प्रेस वार्ता केरलम व बंगाल में की।

अब सीएम चुनने का भी काम:

कांग्रेस आलाकमान ने केरल में सीएम चुनने के लिए विधायकों की राय जानने का जिम्मा भी सचिन पायलट को बतौर वरिष्ठ पर्यवेक्षक दिया है। उनके सहयोगी इमरान प्रतापगढ़ी है। सचिन विधायक दल की बैठक कर उनकी राय जानेंगे और रिपोर्ट आलाकमान को देंगे। एक लाइन का प्रस्ताव पास कराएंगे। आलाकमान सीएम तय करेगा। 

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समय यूं बदलता है ...

एक समय में आलाकमान ने राजस्थान में विधायक दल की बैठक सचिन पायलट की बात सुनने के लिए बुलाई। पर्यवेक्षक अभी के पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व अजय माकन थे, सीएम अशोक गहलोत थे। मगर सीएम आवास पर पर्यवेक्षक प्रतीक्षा करते रहे, जिनमें सचिन भी शामिल थे, पूरे विधायक नहीं आये। विधानसभा अध्यक्ष के पास गए और सशर्त इस्तीफे देकर आये। 

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विधायक दल की बैठक नहीं हुई। मगर सचिन का कद आलाकमान ने बढ़ा दिया। उनको सीडब्ल्यूसी का सदस्य व पार्टी का महासचिव बना दिया। उनको छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया और अब वे कांग्रेस के मुख्य स्टार प्रचारक है। आलाकमान की नजरों में केरलम की जीत के बाद उनका कद और बढ़ गया है।

बदलेंगे राज्य के समीकरण:

राज्य में सीधे सीधे कांग्रेस दो गुटों में बंटी दिखती है, एक गुट अशोक गहलोत का और दूसरा सचिन पायलट का। हालांकि एक गुट अब गोविंद डोटासरा का भी बन रहा है। गहलोत पिछले एक महीनें से लगातार मानेसर का जिक्र कर अपरोक्ष रूप से पायलट पर हमला बोल रहे है, मगर पायलट खामोश है। ये खामोशी उनकी ताकत बन गयी है। उनके समर्थक विधायक मुकेश भाकर, अभिषेक पूनिया, रामनिवास गावड़िया आदि जरूर अब बोल रहे है। मगर हालातों को देखते हुए लगता है कि राजस्थान कांग्रेस में भी अब जल्दी ही नये समीकरण बनेंगे।

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