RudraNewsExpress_Logo

पोस्टर - होर्डिंग वार में दिखी दूरियां, संगठन नहीं, सरकार के हिस्सेदार ही नजर आये सब तरफ

सीएम के दौरे के बाद भी नेताओं की मिट नहीं पाई दरार, चुनावों पर होगा असर
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
d

RNE Special.
 

राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह इस बार बीकानेर के महाराजा करणीसिंह स्टेडियम में हुआ। राज्य के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा दो दिन बीकानेर में रहे। पूरा सरकारी तंत्र दौरे को सफल बनाने में लगा हुआ था। कहीं कुछ गड़बड़ न हो इस कारण व्यवस्थाओं की कमान जिले के आला अफसरों के साथ राज्य के अधिकारियों ने भी संभाली हुई थी। भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं ने शहर की दीवारें होर्डिंग से और अखबार  विज्ञापनों से पाट रखे थे।

यह सब तो होता ही है। हर राज में तब तब होता है जब सीएम किसी जिले के दौरे पर पहुंचता है। एक रस्म है जो निभाई ही जाती है। छोटे - बड़े नेता होर्डिंग व विज्ञापनों पर इस कारण खर्च करते हैं कि भूले भटके ही सही एक नजर उनके होर्डिंग व उस पर लगी उनकी तस्वीर पर सीएम साहब की पड़ जाये। इस चाह के स्थानीय अपने स्थानीय राजनीतिक आका को भी इन होर्डिंग से खुश करने और दूसरे नेताओं को जलाने की रहती है।
अक्सर राजनीति में यह देखा गया है कि नेगेटिव प्रयास ज्यादा असरकारक होते हैं। आग भी लगती है और धुंआ भी उठता है। इस कारण दूसरी पंक्ति के नेता और कार्यकर्ता अपने राजनीतिक आका को खुश करने के बजाय उस नेता को कमतर दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं जिससे उनके आका की बनती नहीं। इस बार के सीएम के दौरे में भी यही सब कुछ हुआ और कई राजनीतिक सवाल खड़े भी हो गये जो सीएम के जाने के बाद हवा में तैर रहे हैं और पाटों पर चर्चा पाये हुए हैं।

 

होर्डिंग वार में दिखी दूरियां
 

मुख्यमंत्री के इस दौरे में जो होर्डिंग लगे, वे संख्या में बहुत अधिक थे मगर उनके पीछे भी राजनीति छिपी जरूर नजर आयी। किसी भी शहर में राजनीतिक गुटबाजी का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यह गुटों की राजनीति केवल भाजपा में हो, ऐसा भी नहीं है। भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही इस तरह की गुटबाजी के तकडे शिकार रहते हैं और गाहे - बगाहे गुटबाजी को सार्वजनिक भी लाते हैं।
पर इस बार मुख्यमंत्री का जो दौरा था, वह राजनीतिक नहीं था। स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में वे बीकानेर आये थे। यदि भाजपा के नेता चाहते तो इस तरह की गुटबाजी से बच भी सकते थे। पर शायद उनको लगा कि यह तो मुख्यमंत्री तक संदेश पहुंचाने का अच्छा अवसर है, चूकना नहीं चाहिए। 

होर्डिंग वार में यह सब उभर के सामने भी आया कि यहां भाजपा में गुट है और वे एक गुट को बिल्कुल भी नहीं स्वीकारते। दो विधायकों के होर्डिंग ऐसे थे, जिन पर एक बड़े नेता का फोटो व नाम ही नहीं था। अलग भी नजर आएं और आलोचना भी न हो, इस वजह से अन्य विधायकों के फोटो भी उस पर नहीं लगाए गए। बहुत करीने से विधि सम्मत दिखने वाले होर्डिंग लगे, मगर ये पब्लिक है - सब जानती है। गुटों की टकराहट की जानकारी से वह नावाकिफ नहीं है।
 

हर जगह संगठन दिखा दूसरे पायदान पर
 

किसी भी राजनीतिक दल की सरकार तभी मजबूत रहती है और जनता में अपनी अच्छी छवि बनाए रख सकती है, जबकि उसमें सत्ता और संगठन के बीच बेहतर तालमेल हो। कुछ स्थानों पर जनता के बजाय संगठन को अधिक महत्त्व मिले। इससे जनता में पार्टी की साख बनती है। क्योंकि वोटर को बूथ तक लाने और उससे वादा करने वाला उम्मीदवार नहीं होता, बूथ पर बैठने वाला, हर समय शहर में रहने वाला पार्टी का कार्यकर्ता व पदाधिकारी होता है। इस कारण ही सत्ता व संगठन में बेहतर तालमेल ही दल के लिए लाभदायी रहता है।
 

मगर सीएम के इस दौरे में अधिकतर जगहों पर विधायक या यूं कहें कि सत्ता के सीधे भागीदार ही प्रमुखता से नजर आए, संगठन के पदाधिकारी नहीं। पार्टी के संभाग कार्यालय में सीएम जरूर गए, मगर स्थानीय जन प्रतिनिधियों ने संगठन को आगे आने देने के लिए अपनी तरफ से कोई पहल नहीं की, यह कड़वा सच है। जबकि भाजपा केडर बेस पार्टी मानी जाती है और यहां कार्यकर्ता को अधिक सम्मान मिलता रहा है। बीकानेर में इस बार के सीएम दौरे के समय तस्वीर कुछ बदली हुई थी।

दूरियां नहीं मिटी, चुनाव पर पड़ेगा असर:

आने वाला समय भाजपा व कांग्रेस, दोनों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि अब स्थानीय निकाय व पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। इन चुनावों को अगले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। यह चुनाव इस बात को अभिव्यक्त कर देंगे कि राज्य में अगली सरकार किसकी बनेगी। 
 

इस चुनावी समय में भाजपा के लिए यह जरूरी है कि सत्ता और संगठन के बीच बेहतर तालमेल हो। यह तालमेल ही इन चुनावों में सफलता दिलाता है। 
 

बीकानेर के भाजपा नेताओं में दूरियां है, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता। सांसद व 7 सीटों में से 6 पर भाजपा के विधायक है, मगर फिर भी स्थिति बेहतर नहीं है। क्योंकि इन नेताओं के मध्य दूरियां है। ये साथ नहीं है। अवसर मिलते ही परोक्ष - अपरोक्ष रूप से एक दूसरे पर राजनीतिक प्रहार करने से भी नहीं चूकते। इन नेताओं की टकराहट से बीकानेर की आम जनता भी वाकिफ हैं।

पंचायती राज संस्थाओं में तो 30 साल से कांग्रेस का वर्चस्व है। उसे तोड़ना भाजपा के लिए आसान काम नहीं। फिर उस हालत में जबकि ये टकराहट कायम है। वहीं पिछली बार भी नगर निगम ने भले ही मेयर बना लिया हो, मगर उसे बहुमत नहीं मिला था। जोड़ तोड़ के बूते ही भाजपा मेयर जीता सकी थी।
 

मुख्यमंत्री के इन चुनावों से पहले बीकानेर आने पर यह उम्मीद जगी थी कि नेताओं की दूरियां कम होगी। सभी नेता मिलकर स्थानीय निकाय व पंचायत के चुनाव लड़ेंगे। संगठन व सत्ता के बीच दूरी नहीं रहेगी। सीएम दूरियों को पाटने का काम करेंगे। मगर सीएम के इस दौरे से भी नेताओं के बीच की दूरियां नहीं मिटी, यह तो होर्डिंग वार से ही स्पष्ट है। इस सूरत में भाजपा के लिए स्थानीय निकाय व पंचायत चुनाव की राह आसान नहीं रहेगी।

FROM AROUND THE WEB