जनरंजन : जिला प्रमुख में कांग्रेस की राह आसान नहीं, कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान बिगाड़ सकती है पूरा खेल, डूडी गुट व गोविंद मेघवाल में टिकट के लिए होगा घमासान, भाजपा को कांग्रेस की आपसी लड़ाई से बड़ी आस
बीकानेर जिला प्रमुख के चुनाव पर अब पूरे ग्रामीण क्षेत्र की नजरें टिकी हुई है। सामान्य वर्ग के लिए इस बार यह सीट आरक्षित है। भाजपा अब तक एक बार भी बीकानेर में अपना जिला प्रमुख नहीं बना पाई है, इस बार वो भी पूरी आस लगाए हुए है। भाजपा की आस कांग्रेस की आपसी लड़ाई पर टिकी हुई है। क्योंकि जिला प्रमुख के चुनाव में डूडी गुट व पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल गुट आपस में टिकट को लेकर उलझेंगे। क्योंकि दोनों गुटों के बीच 8 माह से तनातनी परवान पर है।
मधु आचार्य ' आशावादी '
बीकानेर जिला प्रमुख के चुनाव की उलटी गिनती अब शुरू हो गई है। कुछ जिला परिषद के वार्डों में मतदान हो गया और कुछ में अभी शेष है। मगर पूरे ग्रामीण क्षेत्र की निगाहें जिला प्रमुख सीट पर ही टिकी हुई है। इस सीट पर भाजपा एक बार भी चुनाव नहीं जीत सकी है। कांग्रेस का ही सदा से जिला प्रमुख पद पर कब्जा रहा है। गत 30 सालों से तो दिवंगत कांग्रेस नेता, किसान केसरी स्व रामेश्वर डूडी का ही वर्चस्व इस पद पर रहा है।
स्व रामेश्वर डूडी स्वयं दो बार जिला प्रमुख रहे हैं और बाकी समय उन्होंने जिसको चाहा वो जिला प्रमुख बना है। एक साल पहले रामेश्वर डूडी का असामयिक निधन हो गया। अब उनकी विरासत उनके ही गुट के पास रहती है या नहीं, यही जिज्ञासा हर ग्रामीण के मन में है।
डूडी की बीमारी के चलते पिछला विधानसभा चुनाव नोखा से उनकी धर्मपत्नी सुशीला डूडी ने लड़ा, जिनको नोखा की जनता ने जिताया भी। इस बार पंचायत राज चुनाव की कमान भी डूडी गुट की तरफ से सुशीला डूडी व देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिसनाराम सियाग के पास ही है।
मगर इस बार कांग्रेस के भीतर की राजनीति बदली हुई है। स्व डूडी थे तब तक उनको पार्टी के भीतर से कभी मजबूत चुनोती नहीं मिली, मगर इस बार डूडी गुट को भीतर से ही चुनोती मिल रही है। पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल उनके सामने है और वे भी इस बार अपनी पसंद का जिला प्रमुख चाहते हैं। दोनों गुटों के मध्य तल्खी साफ देखी जा सकती है।
डूडी - मेघवाल की टकराहट नई नहीं है
बीकानेर देहात की कांग्रेस राजनीति में डूडी व मेघवाल की टकराहट नई नहीं है। पिछले पंचायत राज चुनाव के समय में भी टिकट की लड़ाई इन दोनों के बीच रही थी। मेघवाल की पत्नी और पुत्री जिला परिषद का चुनाव जीते थे। मेघवाल अपनी पुत्री सरिता चौहान के लिए जिला प्रमुख का टिकट मांग रहे थे, वहीं डूडी अपने गुट के मोडाराम मेघवाल के लिए टिकट लेने पर अड़े हुए थे। आखिरकार मोडाराम मेघवाल को टिकट मिली और वे जिला प्रमुख बने।
इस बार पंचायत राज चुनाव से 6 महीनें पहले फिर डूडी गुट व मेघवाल आमने - सामने हो गए। मेघवाल के एक कथित ऑडियो - वीडियो को लेकर तकरार हुई जो प्रदर्शन, बयान आदि तक पहुंची। मेघवाल को पूर्व सीएम अशोक गहलोत का निकटस्थ माना जाता है तो पीसीसी चीफ का वरदहस्त डूडी गुट पर माना जाता है। डोटासरा सहित प्रदेश के नेताओं ने चुनाव से पहले इस झगड़े को खत्म कराने के प्रयास भी किये, ताकि पार्टी को नुकसान न हो। मगर साफ दिखता है कि टकराहट वैसी की वैसी बनी हुई है। बयानों में भले ही दोनों तरफ से एक हैं, कहा जा रहा है, मगर सत्य सभी जानते हैं।
डूडी परिवार पहली बार उतरा है चुनावी मैदान में
जब तक रामेश्वर डूडी राजनीति में थे, तब तक उनके परिवार से कोई भी दूसरा राजनीति में नहीं उतरा। मगर वो परम्परा इस बार के पंचायत चुनाव में टूट रही है। अभी स्व डूडी की धर्मपत्नी सुशीला डूडी नोखा से विधायक है, फिर भी उनकी पुत्र वधु निकिता डूडी जिला परिषद का चुनाव लड़ रही है। उनको जिला प्रमुख के लिए भी स्वाभाविक उम्मीदवार माना जा रहा है।
निकिता व सरिता में टिकट के लिए होगी घमासान
जिला परिषद का चुनाव यदि निकिता डूडी व सरिता चौहान जीत जाते हैं तो इन दोनों के मध्य ही कांग्रेस के जिला प्रमुख के टिकट के लिए घमासान होगा। सरिता चौहान पिछली बार भी जिला प्रमुख की दावेदार थी, सीट भी अजा वर्ग के लिए आरक्षित थी, मगर उनको टिकट नहीं दिया गया। इस बार उनके टिकट के लिए पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल पूरी शक्ति लगाएंगे।
वहीं दूसरी तरफ नोखा विधायक सुशीला डूडी व देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिसनाराम सियाग निकिता डूडी के टिकट के लिए दबाव बनाएंगे। पार्टी के लिए जिला प्रमुख के टिकट के लिए नाम तय करना आसान नहीं रहेगा। इस वजह से ही माना जा रहा है कि इस बार डूडी परिवार के लिए राह आसान नहीं है।
भाजपा को टकराहट से फायदे की उम्मीद
भाजपा टकटकी लगाए डूडी गुट व मेघवाल की टकराहट पर निगाहें गड़ाए हुए है। उसे इस टकराहट से ही बड़े फायदे की उम्मीद है। टिकट तो किसी एक गुट को मिलेगा, उस स्थिति में दूसरा गुट क्या करता है, यह देखने की बात होगी। प्रदेश कांग्रेस कैसे इस फूट को रोकेगी, यह भी एक बड़ा सवाल है। कड़े मुकाबले में यदि हनुमान बेनीवाल की आरएलपी कुछ सीट जीतती है तो उनकी बड़ी भूमिका हो जाएगी।

