भाजपा में राजे के बाद सबसे वरिष्ठ है राठौड़, राज्यसभा के लिए जातीय समीकरण के कारण फिर रह गए
अपने को पार्टी अध्यक्ष के लिए योग्य नहीं माना राठौड़ ने
बयान में कहीं न कहीं थोड़ा दर्द तो झलकता दिखता है
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के जिन दो बड़े कद्दावर नेताओं को पराजय झेलनी पड़ी, वे अभी तक मुख्य धारा में नहीं आ सके हैं। उन दोनों बड़े नेताओं का राजस्थान की भाजपा को बड़ा योगदान रहा है। वे भाजपा के नेता नहीं अपितु निष्ठावान कार्यकर्ता है। जिनकी हार से पार्टी व पार्टी के बड़े धड़ों को गहरा धक्का लगा।
विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा को बहुमत मिल गया। पार्टी की सरकार बन गयी। कांग्रेस की सरकार सत्ता से बेदखल हो गयी। पार्टी के हाथ एक बड़ा राज्य लगा, मगर इन दो बड़े नेताओं की हार का अमिट दर्द भी दो बड़े ग्रुप को झेलना पड़ा।

पहली हार थी पूर्व प्रदेशाध्यक्ष, एक समर्पित कार्यकर्ता व प्रदेश के बड़े जातिगत धड़े जाट समाज के नेता सतीश पूनिया की। पूनिया का पार्टी में क्रमवार विकास हुआ है। वे विद्यार्थी परिषद से सार्वजनिक जीवन में आये और सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष तक पहुंचे। विधानसभा चुनाव वे हार गए। यह बड़ा झटका था।
दूसरे जो सबसे कद्दावर नेता विधानसभा चुनाव हारे वे थे पूर्व नेता प्रतिपक्ष, तेजतर्रार नेता व विधानसभा में फ्लोर मैनेजमेंट के कारीगर राजेन्द्र राठौड़। जो प्रदेश के एक बडे जातिगत धड़े राजपूत समाज के बड़े नेता थे। मगर उनको 7 चुनाव जीतने के बाद भी तारानगर में हार का मुंह देखना पड़ा।

राठौड़ की हार एक बड़ा झटका उनके लिए, पार्टी के लिए व समाज के लिए था। क्योंकि प्रदेश में राठौड़ वसुंधरा राजे के बाद उन गिने चुने नेताओं में से है, जिन पर जनता को भरोसा है। वे दुख में राहत के लिए पूरे प्रदेश से उनके पास पहुंचते हैं। राठौड़ उनकी हर सम्भव मदद भी करते हैं। हर जिले में राठौड़ के मित्र, पार्टी के नेता, कार्यकर्ता मिलेंगे। प्रदेश के इंटलेक्चुअल्स के लिए भी वे बड़ा भरोसा थे। सही और साफ बात कही जाए तो प्रदेश के लोग उनकी गिनती उन नेताओं में शुमार करते थे, जिनको पार्टी कभी भी सीएम भी बना सकती थी। इस पद के भी वे पार्टी व लोगों की नजरों में योग्य थे।

इस तरह एक बड़े राजपूत समाज के नेता राजेन्द्र राठौड़ व दूसरे बड़े जाट समाज के नेता सतीश पूनिया की हार बड़ी राजनीतिक घटना थी। पार्टी ने भजनलाल शर्मा जी को सीएम बनाया ढाई साल पहले। तबसे यह उम्मीद थी कि इन दोनों नेताओं को भी जल्द ही एडजस्ट कर पार्टी की तरफ से बड़ी जिम्मेदारी दी जायेगी।
मगर ढाई साल तक उडीक रही:
विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनाव हुए। तब इस तरह के कयास रहे कि राठौड़ को लोकसभा का टिकट देकर उनकी क्षमता के अनुरूप केंद्र में सक्रिय किया जाएगा। किन्तु लोकसभा टिकट कई सीटें जाट व राजपूत बहुल होने के बाद भी पूनिया व राठौड़ को टिकट नहीं मिला। लेकिन दोनों नेताओं की पार्टी निष्ठा असंदिग्ध है, इस कारण वे अपने काम में लगे रहे।

फिर लगा इनमे से एक को प्रदेश अध्यक्ष व एक को बड़े विभाग की जिम्मेदारी मंत्री के दर्जे के साथ मिल सकती है। मगर ये भी लोगों का केवल कयास ही रहा। पार्टी अपने तरीके से सोचती हैं और जनता व समर्थक अपने तरीके से। ढाई साल में अनेक अवसर आये जब लगा कि इन नेताओं को अब जिम्मेवारी निलने वाली है, मगर बात बन नहीं पाती। दोनों नेताओं के समाज मे उतावलापन ज्यादा था। जो सार्वजनिक रूप से प्रकट भी होने लग गया।
फिर आया राज्यसभा चुनाव:
ढाई साल बाद राज्यसभा चुनाव आया। नेताओं व कार्यकर्ताओं में इन दोनों नेताओं के लिए फिर उम्मीदें जगी। भाजपा के हिस्से में 2 सीटें आनी थी। कयास यह था कि राठौड़ व पूनिया को एडजेस्ट किया जायेगा। कयास कोई ख्याली भी नहीं था।

मगर यहां भी एक बड़े नेता राठौड़ पीछे छुर गए। हरियाणा प्रभारी के रूप में सतीश पूनिया ने भाजपा को बड़ी सफलता दिलाई थी तो एक सीट पर तो उनको टिकट दे दिया गया। चूंकि अब राज्य में कांग्रेस की कमान सचिन पायलट के पास जानी है तो एक गुर्जर का चयन राज्यसभा की दूसरी सीट के लिए कर लिया गया। टिकट राठौड़ को नहीं, अलका गुर्जर को मिल गया।जातीय समीकरणों के चक्र में राठौड़ पीछे रह गए।

इस बार उनके समर्थक व समाज के लोगों का धैर्य टूट गया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से आलोचना कर दी। जबकि राठौड़ सदा की तरह पार्टी के प्रति निष्ठावान रहे और पार्टी के निर्णय के साथ मजबूती से खड़े रहे, खड़े हैं। मगर उनके समर्थकों का धैर्य का बांध अब टूट गया, यह भी साफ दिख रहा है।
प्रदेशाध्यक्ष के लिए खुद को योग्य नहीं माना:
जब अधिक उबाल आया राजनीति में तो राठौड़ को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की बात चली। पत्रकार उनसे बात करने पहुंचे तो उन्होंने साफ कहा कि वे अपने को प्रदेशाध्यक्ष के लिए योग्य नहीं मानते। यह पूर्ण विराम लगाने वाला बयान था। क्योंकि इस बयान के पीछे कहीं न कहीं थोड़ा दर्द तो झलकता ही है। मगर राठौड़ की पार्टी निष्ठा पर सवाल न कभी उठा, न उठने की संभावना है, इस वजह से वे इस समय भी पूरी मजबूती के साथ पार्टी के निर्णय के साथ खड़े हैं। भविष्य राजनीति को किस दिशा की तरफ लेकर जाएगा, यह तो समय ही बताएगा। मगर राठौड़ के बारबार पीछे छूट जाने का मलाल कार्यकर्ताओं, समाज के लोगों को तो है, इसमें कोई संदेह नहीं।

