प्रदेश से जिला स्तर तक की गुटबाजी दूर करना चुनोती, नेताओं की आपसी टकराहट बढायेगी मुश्किलें
नेताओं की अहम की लड़ाई लड़ लगाम जरूरी
मधु अचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
स्वतंत्रता दिवस के बाद कभी भी राज्य में स्थानीय निकाय व पंचायत राज के चुनावों की तारीखों का ऐलान हो सकता है। ओबीसी आयोग भी अब तो राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट दे चुकी है। अब चुनाव टलने के कोई आसार नहीं है। क्योंकि माननीय न्यायालय के आदेश पर व उसकी देखरेख में ही यह चुनाव हो रहे हैं।

इन चुनावों को विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना जाता है, क्योंकि इससे मतदाता अपने रुख का इजहार कर देता है। वर्तमान सरकार का आधे से अधिक कार्यकाल पूरा हो चुका है, इस वजह से मतदाता उस काम को आधार बनाकर ही मतदान करता है। एक तरह से वर्तमान सरकार पर यह चुनाव एक जनमत होगा। ठीक इसी तरह विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस कैसी रही, उसका मूल्यांकन भी यह चुनाव करेगा।
इन चुनावों के लिए भाजपा और कांग्रेस ने अपनी तरफ से तैयारियां आरम्भ कर दी है। कांग्रेस ने जहां वार्ड से जिला स्तर तक की कमेटियों को सक्रिय किया है, वहीं भाजपा ने रविदास जयंती के आयोजन से सामाजिक समरसता दिवस मना अपनी चुनावी तैयारियां आरम्भ की है। प्रशासनिक स्तर पर भी चुनावी तैयारियां चल रही है। उन प्रशासनिक अधिकारियों का तबादला किया जा रहा है जो गृह जिलो में पदस्थापित है। राज्य में अब स्थानीय निकाय व पंचायती राज चुनावों का माहौल बनने लग गया है। लोग भी सोशल मीडिया के जरिये अपनी दावेदारी जताने लग गए हैं।
भाजपा के लिए भी चुनाव में राह आसान नहीं:
कांग्रेस की तरह भाजपा की स्थिति भी प्रदेश में बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है। वह भी पूरी तरह से गुटबाजी से ग्रसित है, जो अनेकों बार उभर के सामने भी आ जाती है। वैसे भी इस बार बहुमत आने के बाद भाजपा ने विधायक दल के नेता के चुनाव में बिल्कुल ही अलग तरीका अपनाया। केंद्रीय पर्यवेक्षक राजनाथ सिंह जी के हाथ एक पर्ची भेजी गई।

यह पर्ची खोलने का जिम्मा सीएम पद की दावेदार पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को दिया गया। पर्ची में लिखा नाम देखकर पहले राजे चोंकी और जब नाम बोला गया तो निर्वाचित विधायक चोंके। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा बने।
तब से ही भाजपा में दो समानांतर गुट का वजूद है। एक धड़ा पूरी तरह से वसुंधरा राजे के साथ अब भी मजबूती से खड़ा है। इस धड़े के विधायकों को वरिष्ठ व अनुभवी होने के बाद भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। ये वरिष्ठ विधायक अब विधानसभा में चुपचाप बैठे रहते हैं और भाजपा की खिल्ली उड़ते देखते रहते हैं।
वरिष्ठ विधायकों की इस चुप्पी के कारण विपक्ष ज्यादा हमलावर रहता है और अनेक बार कई मंत्री घिर जाते हैं। राज्य सरकार में अभी भी मंत्रियों के 6 पद रिक्त हैं। इन पर बारबार राजे गुट के विधायकों को लेने की बात होती है, मगर केवल बातें ही हुई है। अभी तक इन रिक्त पदों को भरा ही नहीं गया है।
तबादलों से भी असंतोष उपजा:
सरकार ने तबादलों पर से प्रतिबंध हटाया और स्वास्थ्य विभाग को छोड़कर सभी विभागों में खूब तबादले हुए। मगर इन तबादलों से लोग, पार्टी के विधायक, नेता और संगठन के पदाधिकारी संतुष्ट होने के स्थान पर नाराज ज्यादा हुए। पार्टी के प्रदेश संगठन ने दो मंत्रियो को तो प्रदेश कार्यालय बुलाया और अपनी शिकायत दर्ज कराई। हालांकि पहली बार संगठन के स्तर पर भी तबादलों के आवेदन लिए गए थे। उससे पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं में खुशी थी, मगर परिणाम न मिलने से वे नाराज ज्यादा हो गए।

शिक्षा विभाग में इस बार बड़ी संख्या में तबादले हुए, उनसे भी पार्टी विधायकों व नेताओं में असंतोष पनपा। तृतीय श्रेणी शिक्षकों के तबादलों पर तो प्रतिबन्ध लगा रहा, उससे एक तरफ जहां विधायक व नेता नाराज हुए वहीं दूसरी तरफ इस श्रेणी के शिक्षक भी नाराज हुए। इनको 8 साल से तबादले का लाभ नहीं मिला है। इस असंतोष का भी इन चुनावों पर असर पड़ेगा।
नेताओं की आपसी टकराहट भी चिंता की वजह:
हर संभाग में नेताओं की आपसी टकराहट भाजपा में भी है। अहम की यह लड़ाई चुनाव लड़ असर डालेगी। कई जिलों में तो संगठन व सत्ता के बीच बेहतर तालमेल भी नहीं है, उसका असर तो पड़ेगा ही। पार्टी के प्रदेश नेतृत्त्व ने यदि नेताओं की आपसी टकराहट को दूर नहीं किया तो बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है। कुल मिलाकर स्थानीय निकाय व पंचायत राज चुनावों में सरकार होने के बाद भी भाजपा की राह आसान नहीं है।

