आज की राजनीति में ऐसे नजारे सम्भव ही नहीं लगते, कर्नाटक शुद्ध राजनीतिक बदलाव का श्रेष्ठ उदाहरण बना
काश ! कमलनाथ, गहलोत भी रास्ता अपनाते। लोग याद रखते।
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
राजनीति को अरस्तु ने निष्ठुर बताते हुए अपने समय में कहा था कि उसके दिल नहीं होता। इस कारण राजनीति कठोर होती है, धड़कती ही नहीं। राजनीति शुरू ही तब होती है जब दिल मरता है और दिमाग जिंदा होकर चलने लगता है। राजनीति दिल का नहीं दिमाग का ही खेल तब से बनकर रह गया है, जहां सारे निर्णय दिमाग से ही लिए जाते है।

सुप्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक प्लेटो का जो सिद्धांत है उसके अनुसार भी राजनीति करते समय नेता व्यावहारिक रहता है, भावुक जरा सा भी नहीं होता। भावुकता में लिए गए निर्णय राजनीति के लिए गलत होते है, उनसे बचना चाहिए। राजनीति तो भावुकता और भावना से खेलकर वोट पाने की चीज ही रह गए है।
अब इसी सिद्धांत को आज के हर राजनेता ने अपना लिया। वे अपने चेलों को भी यही सिखाते है। ताकि वे राह भटककर अलग तरह से सोचने न लग जाये। मगर आजादी के बाद हमने अनेक नेताओं को देखा है जिन्होंने भावुक कनेक्ट अपनी पब्लिक से रखा, वे बेहद सफल रहे। उनको बड़ी बड़ी राजनीतिक साजिशें भी परास्त नहीं कर सकी। वे अजेय रहे।
इस सूची में हम इंदिरा गांधी, सरदार पटेल, अटल बिहारी वाजपेयी, मुलायम सिंह यादव, इंद्रजीत गुप्त, सोमनाथ चटर्जी, लालू यादव, नीतीश कुमार, कर्पूरी ठाकुर, रामकृष्ण हेगड़े, तरुण गोगोई, ज्योति बसु, अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी, बरकततुल्लाह खान, हरिदेव जोशी सहित अनेक नामों का उल्लेख कर सकते है। मगर इन सबके इमोशनल कनेक्ट को भी आज के नेता व राजनीति इग्नोर करते है, यह समझ से परे है।
भावुक माहौल में बदला कर्नाटक:
कर्नाटक में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो यह तय हुआ कि आधे समय सिद्धारमैया व आधे समय डी के शिवकुमार मुख्यमंत्री बनेंगे। डीके अंतिम ढाई साल रहेंगे। दोनों ने पार्टी नेताओं की बात को माना। सिद्धारमैया सीएम बन गए। आधा समय बीतने पर डीके ने सार्वजनिक नहीं, पार्टी नेताओं को याद दिलाया। उन्होंने कहा रुको। वो चुप हो गए। पब्लिक में यही कहा कि जैसा आलाकमान कहेगा, वैसा ही करेंगे।

कोई विद्रोह के दोनों तरफ से बयान नहीं। एक दूसरे पर आरोप नहीं। व्यवहार में कटुता नहीं। सरकार के काम में बाधा नहीं। पब्लिक में गलतफहमी नहीं। बस एक ही बात, आलाकमान का आदेश सर्वोपरि। कांग्रेस के नेता ये कहते भर है पर करते नहीं, मगर सिद्धारमैया व डीके ने यह किया भी।
आलाकमान ने कहा कि दोनों एक दूसरे के घर जाकर एक टेबिल पर बैठकर नाश्ता करो, दोनों ने यह आदेश भी माना। दोनों के समर्थकों में से जिसका भी विधायक बोलता तो नेता स्पष्टीकरण देता, नेतृत्त्व परिवर्तन की बातें भ्रामक है। हम आलाकमान के सिपाही है, जो जब भी जो आदेश देंगे उसे अदब के साथ स्वीकारेंगे। सच में, सिद्धारमैया व डीके ने ऐसा निभाया भी। इतने भावुक पल में राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण पहला, बड़ा और सदा याद रखने वाला उदाहरण है।
कर्नाटक बना नया उदाहरण:
राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र का कर्नाटक देश मे एक बड़ा उदाहरण बन गया। जिसे देखकर कांग्रेस के अलावा सभी दल विस्मित है। कांग्रेस विस्मित इसलिए नहीं कि दोनों नेताओं लगातार उनके आदेश को मान जता दिया था कि हम हर आदेश मानेंगे। तभी तो कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता को कर्नाटक मामला सुलझाने के लिए जाना नहीं पड़ा।

कांग्रेस के भीतर नया नैरेटिव सेट:
इस नेतृत्त्व के बाद कांग्रेस के भीतर नया नैरेटिव सेट हो गया। आलाकमान फिर से शक्ति पुंज बन गया। मतलब अनुशासन पर अब कोई समझौता नही होगा। चाहे कोई कितना भी बड़ा नेता क्यों न हो। कांग्रेस में सकारात्मक बदलाव का यह समय माना जाना चाहिए।
काश ! कमलनाथ, गहलोत भी...
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत। पहले मध्यप्रदेश में समय आया। जब कांग्रेस को बहुमत मिला। ज्योतिरादित्य सिंधिया की बड़ी मेहनत थी। मगर सीएम के लिए कमलनाथ विधायक लेकर अड़ गए। सिंधिया को बनने नहीं दिया। पार्टी टूटी। राज गया। सिंधिया भाजपा में गये, विधायक लेकर गए। भाजपा का राज बना जो आज भी कायम है। पार्टी कार्यकर्ता कर्नाटक देखकर कहते है काश ! कमलनाथ उस समय सिद्धारमैया बनते।

और राजस्थान में भी यही हुआ
राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की मेहनत से राज आया। सीएम के लिए अशोक गहलोत भी दावेदार बन गए। लंबी खींचतान चली। गहलोत बन गए। यहां भी ढाई साल बाद सीएम सचिन को बनाने की बात हुई।

नियत अवधि पर आलाकमान को याद दिलाया गया। उन्होंने जयपुर में विधायक दल की बैठक बुलाई। मल्लिकार्जुन खड़गे व अजय माकन को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा गया। गहलोत उनके आने से पहले तन्नौट चले गए, जो शाम को बैठक से थोड़ी देर पहले पहुंचे। गहलोत समर्थक बैठक में आये ही नहीं और बसों में भरकर विधानसभा अध्यक्ष सी पी जोशी के निवास पहुंच इस्तीफे सौंप दिए। कह दिया कि आलाकमान यदि गहलौत का इस्तीफा लेता है तो हमारा विधायक से इस्तीफा स्वीकार लें। यह घोर अनुशासनहीनता थी। कांग्रेस के इतिहास में आलाकमान व पर्यवेक्षकों की ऐसी बेइज्जती कभी नहीं की गई। सचिन सीएम नहीं बन सके, मगर बोले नहीं। आलाकमान पर भरोसा जताया। बिल्कुल डीके की तरह। सचिन डीके बने मगर गहलोत सिद्धारमैया नहीं। ये अब 3 दिन से देश के कांग्रेसी कह रहे है। यदि सचिन कमिटमेंट के अनुसार सीएम बन जाते तो सर्वे के मुताबिक आज राज्य में कांग्रेस की सरकार सम्भव थी।
उस समय के कुछ बोल:
कांग्रेस ने जिनको इतनी बार टिकट देकर विधायक, सांसद बनाया वे थे वरिष्ठ नेता शांति धारीवाल। इस्तीफा देने वालों को लीड कर रहे थे। आलाकमान की याद दिलाई तो अहंकार में बोले --- राजस्थान में आलाकमान अशोक गहलोत है, दूसरा कोई नहीं। विधायक ज्यादा उनके पास थे, तभी तो भावुकता दब गई और राजनीतिक निष्ठुरता ने अहंकार भर दिया, यह बोले और धड़ल्ले से बोले।

अब बात खुद अशोक गहलोत की। सोनिया गांधी की बात नहीं मानी पर प्रेस से कहते रहे कि मेरा इस्तीफा तो सोनिया जी के पास पड़ा है। बाहर आकर मीडिया से कहते - मैं तो कुर्सी छोड़ना चाहता हूं, कुर्सी मुझे नहीं छोड़ती।
काश ! उनको भी उस समय सिद्धारमैया याद आते !!

