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डूडी गुट v/s गोविंद झगड़ा अब पीसीसी व दिल्ली के नेताओं के पाले में, प्रदेश की गुटीय राजनीति का भी इस पर असर

पीसीसी चीफ की चुप्पी भी खड़े कर रही सवाल
पंचायत चुनाव से पहले निदान नहीं हुआ तो होगा नुकसान
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.
 

कांग्रेस में ' आलाकमान ' का हस्तक्षेप अब भी कम नहीं हुआ है। हर फैसले पर वहां से मुहर लगनी जरुरी होती है। जिले का मसला हो या प्रदेश का, फैसला तो दिल्ली दरबार मे ही होता है। इस वजह से ही तो कांग्रेस में कोई भी मसला उलझे तो टकराने वाले नेता सीधे दिल्ली की तरफ भागते है, ताकि वहां जाकर पहले अपना पक्ष रख दें ताकि दूसरा आये तब तक उसका प्रभाव हल्का हो जाये।

बीकानेर कांग्रेस में उपजा विवाद भी वर्तमान में इसी ढलान पर चल रहा है। यह ढलान आलाकमान तक पहुंचकर ही रुकेगी। पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल के एक कथित वीडियो व ऑडियो से यह विवाद आरम्भ हुआ था। इस वीडियो व ऑडियो में दिग्गज किसान व जाट नेता रामेश्वर डूडी पर कुछ आपत्तिजनक राजनीतिक टिप्पणी है, जो गोविंद मेघवाल की कही जा रही है। 
 

उससे ही कांग्रेस में आपसी लड़ाई शुरू हुई। डूडी समर्थक इस वीडियो व ऑडियो से खासे नाराज हुए और देहात युवक कांग्रेस ने तो एक बड़ा प्रदर्शन कर गोविंद मेघवाल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही तक की मांग कर डाली।

गोविंद के समर्थकों का भी प्रदर्शन:
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प्रत्युत्तर में पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल ने भी अपने समर्थकों के साथ प्रदर्शन किया। पहले उसे कांग्रेस के अभियान के आयोजन का नाम दिया गया। मगर पीसीसी के निर्देश के बाद देहात के साथ शहर जिला कांग्रेस ने भी एक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया कि यह पार्टी का आयोजन नहीं। टकराहट का एक बिंदु यहां फिर जुड़ गया।
प्रदर्शन में गोविंद मेघवाल सहित अन्य वक्ताओं ने डूडी व उनके समर्थकों पर कांग्रेस  विरोधी होने व भाजपा की बी टीम के रूप में काम करने का स्पष्ट आरोप लगाया। अन्य कई चुनावों के उदाहरण दिए। मेघवाल ने अपने भाषण में सांसद व केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल व उनके पुत्र रविशेखर पर भी गम्भीर आरोप जड़ गये।
बाकी बातों को एक साइड में रख दे तो उस दिन स्पष्ट रूप से बीकानेर की कांग्रेस दो भागों में बंटी हुई दिखाई दी। जो कांग्रेस के लिए चिंता व भाजपा के लिए राहत की बात है। इसका असर पंचायत राज व स्थानीय निकाय चुनावों पर पड़ेगा, यह तो तय है। एक बात और स्पष्ट हुई कि टकराहट के मूल में कहीं न कहीं पंचायत राज चुनाव भी है।


बीकानेर के कई नेता चुप कैसे ?

कांग्रेस के इस हाई वोल्टेज पोलिटिकल ड्रामा में यहां के कई वरिष्ठ नेताओं की खामोशी पर कई सवाल खड़े हो रहे है। ये वो नेता है जो मंत्री, विधायक तक रहे है। पूर्व मंत्री डॉ बी डी कल्ला, भंवर सिंह भाटी, वीरेंद्र बेनीवाल ने अपने को इस मामले से पूरी तरह दूर कर रखा है। मंगलाराम गौदारा भी नहीं बोले है।


प्रदेश की गुटबाजी तो नहीं ?

प्रदेश की गुटीय राजनीति में गोविंद मेघवाल को अशोक गहलोत का नजदीकी माना जाता है। इस प्रकरण की शुरुआत से अब तक वे लगातार जयपुर जाकर उनसे संपर्क कर रहे है। बीकानेर की मीडिया को भी उन्होंने कहा कि यदि अशोक गहलोत न होते तो लोग मेरी राजनीतिक हत्या कर देते।

गहलोत के साथ उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई। इस मसले पर न तो सचिन पायलट कुछ कह रहे है और न गोविंद डोटासरा कोई प्रतिक्रिया दे रहे है। दोनों की चुप्पी पर कई सवाल है।
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वहीं डूडी के कुछ समर्थकों ने दिल्ली का भी रुख किया है। डूडी समर्थक प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा, सांसद दीपेंद्र हुड्डा से भी मिले है। देहात व शहर कांग्रेस अध्यक्षों ने भी जयपुर व दिल्ली में पार्टी के नेताओं से मुलाकात की है।

पंचायत चुनाव पर असर पड़ेगा:

यदि पार्टी संगठन ने इस बढ़ते विवाद का सही और सम्मानजनक तरीके से निस्तारण नहीं किया तो पंचायत राज चुनावों में बड़ा असर पड़ेगा। बीकानेर में पंचायत राज चुनावों में अब तक सदा मजबूत ही रही कांग्रेस को बड़ा नुकसान होगा।

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