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कांग्रेस व भाजपा, दोनों में होगा कुछ बड़ा बदलाव, मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियां होगी

बिछ जायेगी अगले विधानसभा चुनाव की बिसात
 
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.
 

राज्य में भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक ट्रेन धीमी गति से चल रही है, इसी कारण गंतव्य तक देरी से पहुंचेगी। अभी भी हर स्टेशन पर गाड़ी देरी से पहुंच रही है यात्रियों बनाम कार्यकर्ताओं का गुस्सा निकल रहा है। भाजपा राज की पार्टी है इस कारण यहां गुस्से का इजहार कुछ ज्यादा हो रहा है, क्योंकि हरेक 5 साल बाद आये राज में अपनी हिस्सेदारी चाहता है। वैसे भी राज्य में हर 5 साल बाद सरकार बदलने की परंपरा है।

भाजपा सरकार में सीएम सहित कुल 30 मंत्री हो सकते हैं, मगर जब से सरकार का गठन हुआ है तब से ही 24 मंत्री सरकार चला रहे हैं। 6 मंत्रियो की तलाश आज तक पूरी नहीं हुई है, या यूं कहें कि 6 योग्य विधायक नहीं मिल रहे, जिनको मंत्री बनाया जा सके। इन टिप्पणियों में भले ही तल्खी हो, मगर यह सच है कि सीएम को अभी तक 6 मंत्रियो के लिए केंद्रीय नेतृत्त्व से हरी झंडी नहीं मिली है। इसे क्या माना जाये, यह बड़ा सवाल है ?
भाजपा सरकार के पास बहुमत है और उसने कुछ उप चुनाव भी वादों के सहारे जीते, उसके बाद भी कोई मंत्री पद नहीं पा सका है। इसके अलावा अनेक बार सियासी गलियारों में यह भी चर्चा चली की मंत्रिमंडल का पुनर्गठन होगा। कुछ मंत्री हटाये जाएंगे और कुछ का विभाग बदला जायेगा। वो काम भी आज तक नहीं हो सका है। इससे मंत्री पद की उम्मीद रखने वाले और बड़ी लॉबिंग करने वाले भी नाराज हैं। उनकी उम्मीदों को बड़ा धक्का लगा है। 

 

ठीक इसी तरह राजनीतिक नियुक्तियां भी अटकी पड़ी है। कुछ नियुक्तियां राजनीतिक लाभ की दृष्टि से तो कर दी गई। मगर बाकी नियुक्तियों को लेकर केवल बातें ही बातें हुई है, निर्णय कुछ भी नहीं हुआ। जिला से लेकर राज्य स्तर तक की सैकड़ों नियुक्तियां नहीं हो सकी है। कार्यकर्ता थक गए हैं और अब तो निराश भी हो गए हैं।

कांग्रेस के लिए गुटबाजी है समस्या:

भाजपा सत्ता में भागीदारी की कमी को लेकर समस्या से घिरी है तो कांग्रेस की गुटबाजी लाख कोशिशों के बाद भी आलाकमान खत्म नहीं करा पाया है। पहले तो दो गुट थे, अशोक गहलोत व सचिन पायलट का। अब तो एक गुट पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा का भी खड़ा हो गया है। कहां तो आलाकमान दो से एक गुट करना चाहता था, मगर हो गए तीन। 

कांग्रेस आलाकमान ने राज्य में नेतृत्त्व परिवर्तन कर सचिन को कमान देने की तैयारी की थी, मगर यह चर्चा चलते ही अशोक गहलोत हमलावर हो गए। वे सचिन को मानेसर प्रकरण के जरिये घेरने लगे। खूब हमले किये , खेल बिगड़ गया। कांग्रेस ने राज्य में नेतृत्त्व परिवर्तन टालना ही उचित समझा। पहले राज्यसभा चुनाव आ गए और अब निकाय व पंचायत राज के चुनाव। बदलाव एक बार गिर टल गया। 
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यदि कांग्रेस ने गुटबाजी ग्रसित होकर दोनों चुनाव लड़े और पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा तो फिर राहुल कड़े एक्शन लेंगे। राहुल हरियाणा, मध्यप्रदेश व कर्नाटक में ऐसा दिखा चुके हैं। चाहे कुछ भी हो जाये, गुटबाजी कांग्रेस को क्षति तो पहुंचाएगी ही।

इन चुनावों के बाद बदलाव:

भाजपा और कांग्रेस दोनों में निकाय व पंचायत राज चुनाव के बाद बदलाव निश्चित है। कईयों की छुट्टी दोनों पार्टियों में होगी। जिसकी स्क्रिप्ट आलाकमान लिख चुका है। अब उसे इम्प्लीमेंट करना ही बाकी है। प्रदेश की राजनीति में निकाय व पंचायत चुनाव के बाद आमूलचूल परिवर्तन होगा।

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