अदालतों का विकल्प नहीं होंगे Tribunals! राज्यसभा में बिल पेश, अर्जुनराम ने बताई सरकार की सोच
Rudra News Express New Delhi.
संसद के मानसून सत्र में न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा एक अहम विधेयक अब राज्यसभा पहुंच गया है। विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मंगलवार को राज्यसभा में ‘न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026’ पेश किया। इससे पहले लोकसभा इस विधेयक को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच पारित कर चुकी है।
यह विधेयक देश के विभिन्न न्यायाधिकरणों की नियुक्ति, प्रशासन और कामकाज की व्यवस्था में व्यापक सुधार का प्रस्ताव रखता है। सरकार का दावा है कि इसका मकसद न्यायाधिकरणों को अधिक स्वतंत्र, पारदर्शी, प्रभावी और दक्ष बनाना है।
हंगामे के बीच लोकसभा में पास हुआ था बिल :
न्यायाधिकरण सुधार विधेयक सोमवार को लोकसभा में उस समय पारित हुआ, जब विपक्षी सांसद विभिन्न मुद्दों को लेकर जोरदार विरोध कर रहे थे। रिपोर्टों के मुताबिक बिल पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी और हंगामे के बीच इसे पारित किया गया।
ये बोले अर्जुनराम :
लोकसभा में बिल पेश करते हुए अर्जुन राम मेघवाल ने सरकार की मंशा स्पष्ट की थी। उन्होंने कहा था कि Tribunals का उद्देश्य न्यायालयों का विकल्प बनना नहीं है, बल्कि उन्हें एक specialised, efficient and effective complementary institution के रूप में विकसित करना है, ताकि न्याय वितरण यानी justice delivery के उद्देश्य को प्रभावी ढंग से हासिल किया जा सके।
सरकार का बड़ा फोकस -NTC :
विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव National Tribunals Commission (राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग) की स्थापना है।
प्रस्तावित आयोग के जरिए विभिन्न न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति, उनके कामकाज और प्रशासन से जुड़े मामलों में अधिक व्यवस्थित व्यवस्था लाने का प्रयास किया जाएगा। रिपोर्टों के अनुसार प्रस्तावित आयोग लगभग 16 प्रमुख न्यायाधिकरणों और उनसे जुड़े अपीलीय निकायों की नियुक्ति एवं प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
नियुक्ति से लेकर प्रशासन तक बदलेगा सिस्टम :
सरकार का तर्क है कि न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली में एकरूपता और पारदर्शिता जरूरी है। नए विधेयक में अध्यक्षों और सदस्यों की योग्यता, नियुक्ति तथा सेवा शर्तों से जुड़ी व्यवस्था को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है।
इसके साथ ही न्यायाधिकरणों के प्रशासन, बुनियादी ढांचे और रोजमर्रा के कामकाज को बेहतर तरीके से संचालित करने की व्यवस्था प्रस्तावित है।
आखिर क्यों जरूरी नया कानून?
न्यायाधिकरणों की व्यवस्था लंबे समय से न्यायपालिका और सरकार के बीच संवैधानिक बहस का विषय रही है। Tribunals Reforms Act, 2021 की कई व्यवस्थाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे और अदालत ने कुछ प्रावधानों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना। नए विधेयक को इन्हीं कानूनी और संस्थागत चुनौतियों के बीच लाया गया है।
PRS के अनुसार 2026 का विधेयक 2021 के Tribunals Reforms Act को निरस्त करने और न्यायाधिकरणों से जुड़े प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप बनाने का प्रस्ताव रखता है।
सरकार बनाम विपक्ष—बिल पर सियासी घमासान :
इस विधेयक को लेकर संसद में राजनीतिक टकराव भी देखने को मिला। सरकार इसे न्याय वितरण व्यवस्था को मजबूत करने वाला सुधार बता रही है, जबकि विपक्ष की ओर से संसद में चर्चा के तरीके और विधेयक को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
यही वजह है कि लोकसभा में बिल का पारित होना राजनीतिक रूप से भी चर्चा में रहा। अब राज्यसभा में इसकी चर्चा पर सभी की नजरें हैं।
अर्जुनराम के लिए भी अहम बिल :
अर्जुन राम मेघवाल के लिए यह विधेयक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कानून एवं न्याय मंत्रालय से जुड़े इस बड़े सुधार की जिम्मेदारी सीधे उनके पास है। लोकसभा में उन्होंने सरकार का पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया था कि न्यायाधिकरण अदालतों के समानांतर कोई वैकल्पिक न्याय व्यवस्था नहीं होंगे, बल्कि विशेषज्ञता के आधार पर न्याय व्यवस्था को सहयोग देने वाली संस्थाओं के रूप में काम करेंगे।
अब राज्यसभा में बहस के दौरान सरकार को इस बिल के जरिए न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता, नियुक्तियों की पारदर्शिता और प्रशासनिक दक्षता को लेकर अपने प्रस्ताव का बचाव करना होगा।
क्या बदलेगा?
* न्यायाधिकरणों की नियुक्ति व्यवस्था में सुधार
* अध्यक्षों और सदस्यों की योग्यता व सेवा व्यवस्था में एकरूपता
* प्रशासनिक कामकाज को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास
* स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर जोर
* National Tribunals Commission की स्थापना का प्रस्ताव
* न्यायाधिकरणों को न्यायालयों के विकल्प के बजाय विशेषज्ञ सहयोगी संस्थान के रूप में मजबूत करने की कोशिश
अब बड़ा सवाल यह है कि राज्यसभा में विपक्ष इस बिल पर क्या रुख अपनाता है और सरकार इसे किस तरह पारित कराने की रणनीति बनाती है। राज्यसभा की चर्चा इस विधेयक के राजनीतिक और कानूनी भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होगी।

