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अभी तक वार्ड आरक्षण तय नहीं पर उम्मीदवार ठोक रहे दावा, पार्टियां भी तैयार कर रही चुनावी रणनीति

कांग्रेस लगाएगी युवाओं पर दाव, भाजपा को सरकार होने का फायदा
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.
 

बीकानेर एक आलीजा शहर है, यहां हर त्यौहार को बहुत ही उत्साह से मनाया जाता है। रंगों का त्यौहार होली 15 दिन पहले बीकानेर में शुरू हो जाता है और 10 दिन बाद तक भी अनवरत चलता है। हर मोहल्ला, हर गली और हर शख्स होली के रंग में डूबा हुआ मिलता है। इस त्यौहार को केवल रंगों से ही नहीं खेला जाता, उत्साह की अभिव्यक्ति के लिए यहां लोक कलाओं का भी सहारा लिया जाता है। रम्मतें हर चौक में होती है।
दीप पर्व की भी बीकानेर में 15 दिन तक रौनक रहती है। पूरा शहर रोशनी से जगमगा उठता है। सावन के महीने में तो जैसे यहां भोले की भक्ति का अथाह समुद्र हिलोरे लेता है। हर मोहल्ले के अंदर या उसका शिव मंदिर है। जहां पूरे महीनें महादेव के अभिषेक चलते रहते हैं। रात हो या सुबह, दोपहर हो या सांझ, हर वक्त शिव की आराधना करते लोग दिखते हैं।

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कुल मिलाकर बीकानेर शहर के लोग उत्सवजीवी हैं। वे उत्सव का आनंद लेते हैं। बहुत संतोषी हैं यहां के लोग। थोड़े में गुजारा करना जानते हैं। यहां चुनाव भी किसी भी उत्सव की तरह ही लिया जाता है। चुनाव चाहे नगर निगम का हो, विधानसभा का हो या लोकसभा का, यहां के लोग उत्सव ही मानते हैं इन चुनावों को। बीकानेर पाटों का शहर है और चुनाव के समय यह पाटे चुनाव के अलावा दूसरी बात नहीं करते। जितना सटीक चुनावी विश्लेषण राजनीतिज्ञ या सर्वे करने वाले नहीं करते, उनसे कहीं अच्छा और सटीक विश्लेषण शहर के पाटों पर होता है। इस कारण ही तो इन पाटों की चुनावी चर्चा का जिक्र एक बार बीबीसी ने भी किया था।

चुनावी चर्चा की बयार है पाटों पर:

जबसे स्थानीय निकाय चुनावों की घोषणा हुई है, तब से ही शहर के पाटों पर चुनावी बयार भी बहनी आरम्भ हो गयी है। अभी तक न तो मतदान की तारीख तय हुई है, न वार्ड आरक्षण व मेयर आरक्षण की लॉटरी निकली है, न पार्टियों ने उम्मीदवार तय किये हैं, मगर पाटे तो चुनावी चर्चा में डूब गए हैं। दो पक्ष बन गए हैं और गर्मागर्म बहस भी शुरू हो गयी है। 

देखने वालों को यह लगता है कि थोड़ी देर में यह दोनों पक्ष आपस में हाथापाई करेंगे। मगर उसकी आंखें तब फटी की फटी रह जाती है जब थोड़ी देर बाद वह दोनों पक्षों को पाटे पर एक ही थाली में भोजन करते हुए देखता है। भोजन के समय चर्चा पर विराम रहता है। भोजन के बाद फिर पाले मंड जाते हैं और आपस में टकराहट आरम्भ हो जाती है। भागता इनको देखने वाला ही है।
 

पाटे अब निगम चुनाव पर चर्चा आरम्भ कर चुके हैं और अपनी तरफ से पार्षद व मेयर भी जीता चुके हैं। भले ही उम्मीदवार नहीं है, मगर उनको इसकी परवाह नहीं। वे तो पार्टियों को उम्मीदवार मान हार जीत के परिणाम बताने भी लग गए हैं। उनके तर्क अकाट्य है।

उम्मीदवारों की स्वयंभू दावेदारी:

अभी तक वार्ड आरक्षण की लॉटरी नहीं निकली है, पर बीकानेर में शायद ही कोई ऐसा वार्ड हो जहां से किसी ने भी दावेदारी न जताई हो। जो कांग्रेस में है उसने पार्टी से टिकट मांग लिया है और जो भाजपा का है वो भी अपना टिकट पक्का मान के चल रहा है। भला हो एआई का। वो तुरन्त सोशल मीडिया के लिए पोस्टर भी बना देता है और ये स्वयंभू उम्मीदवार उस पोस्टर को फेसबुक, इंस्टाग्राम पर पोस्ट भी कर रहे हैं। 

 

मजे कि बात है कि दोनों पार्टियों से एक वार्ड में एक नहीं, एक से अधिक उम्मीदवार दिख रहे हैं। अब यह मसला कैसे हल होगा, पार्टियों के पदाधिकारियों के भी समझ नहीं आ रहा है।

मगर गम्भीर प्रयास भी हो रहे:

एक तरफ जहां स्वयंभू दावेदार हैं, वहीं पार्टियों ने गम्भीर प्रयास भी आरम्भ कर दिए हैं। दोनों पार्टियों ने बूथ स्तर पर अपनी बैठकें आरम्भ कर दी है। वार्ड व जिला स्तर के नेताओं के साथ पदाधिकारियों ने बैठकर चुनावी रणनीति बनानी शुरू भी कर दी है। 

कांग्रेस इस बार निगम चुनाव में आधे उम्मीदवार युवा उतारेगी, जिनकी उम्र 50 साल से कम होगी। इस आधार पर वार्डवार उम्मीदवारों की तलाश भी आरम्भ हो गयी है। भाजपा जितने वाले उम्मीदवार पर ही जुआ खेलेगी। इस कारण वह जातीय समीकरण का ध्यान रखकर उम्मीदवार तलाशने का काम कर रही है। कुल मिलाकर बीकानेर में निगम चुनावों की बयार शुरू हो गई है।

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