जब राहुल ने वोट कटने की बात उठायी तो अलग थी, जब मुख्य चुनाव आयुक्त पर कांग्रेस बोली तो रुख अलग था
कांग्रेस को सीट शेयरिंग पर टका सा जवाब दिया
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
पिछले लोकसभा चुनाव के समय जब विपक्षी दलों ने मिलकर इंडिया गठबन्धन बनाया तो विपक्ष की राजनीति को एक उम्मीद मिली। तेजी से देश में बढ़ रही भाजपा को गठबंधन से ब्रेक लगा। ब्रेक भी जबरदस्त लगा। जिसकी उम्मीद विपक्षी दलों ने तो की थी, मगर भाजपा ने जरा सी भी नहीं की थी।

भाजपा ने उस चुनाव में अपनी सीट 400 पार ले जाने का लक्ष्य रखा और उसी पर अपने चुनाव प्रचार को भी केंद्रित किया। ' अबकी बार, 400 पार ' का नारा भाजपा और एनडीए के सभी नेता दे रहे थे। मगर उस लक्ष्य तक पहुंचने भी नहीं दिया इंडिया गठबंधन ने। स्थिति तो यह हो गयी कि अकेले भाजपा को बहुमत नहीं मिला, उसे सहयोगियों से मिलकर सरकार बनानी पड़ी। वो ही सरकार अभी देश में चल रही है।

इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने का आरोप भाजपा व एनडीए पर मढ़ा। इसका बचाव भाजपा नेता करते रहे, मगर जनता ने विपक्ष की ही बात को सुना और उसे खूब सीटें दी। कांग्रेस 99 सीट जीत गयी तो उत्तर प्रदेश में सपा 37 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गयी। गठबन्धन की यह ताकत सामने थी, मगर विधानसभा चुनावों में यह गठबंधन कायम नहीं रह सका, जिसमे ममता बनर्जी की बड़ी भूमिका थी।
नेतृत्त्व पर सवाल उठाए, भारी पड़े:
जब लोकसभा चुनाव में बंगाल में ममता दीदी को अच्छी सफलता मिली तो सीधे ही इंडिया गठबंधन के नेतृत्त्व पर सवाल उठा दिए। यहां तक कह दिया कि वे बंगाल से ही इस गठबंधन को आसानी से चला लेगी। उनका समर्थन यूपी में सफल रहे अखिलेश ने किया। अरविंद केजरीवाल ने किया। तेजस्वी यादव ने किया। सुप्रिया सुले ने किया और सबने कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की।

ये दल भूल गए कि राष्ट्रव्यापी छवि केवल कांग्रेस की है और उसके पास सबसे ज्यादा सांसद है। बिना कांग्रेस के कोई विपक्षी दलों का गठबंधन सम्भव ही नहीं। मगर कांग्रेस की गठबन्धन की भावना को इन दलों ने कांग्रेस की कमजोरी समझने की भूल कर ली। केजरीवाल ने हरियाणा में कांग्रेस के सामने लड़कर हराने का काम किया। जिसका प्रतिफल दिल्ली चुनाव में मिला और कांग्रेस न चाहते हुए भी अकेले लड़ी, क्योंकि केजरीवाल ने कह दिया कि हम किसी से समझौता नहीं करेंगे। अन्य विपक्षी दलों ने केजरीवाल का साथ दिया। कांग्रेस दिल्ली में केजरीवाल की हार की बड़ी वजह बनी। जिसमे केजरीवाल का अहं बड़ी वजह रहा।
बंगाल में भी ममता अड़ी:
कांग्रेस इस बार भी लोकसभा की तरह बंगाल विधानसभा चुनाव में भी सम्मानजनक सीट शेयरिंग चाहती थी। 20 से 25 सीट में ही कांग्रेस मान जाती। मगर ममता ने कांग्रेस को एक भी सीट देने से साफ इंकार कर दिया। तब कांग्रेस को अकेले बंगाल में सभी सीट पर चुनाव लड़ना पड़ा। मुस्लिम व अन्य विपक्षी वोट बंटा और परिणाम सामने है।
वहीं कांग्रेस इस बार असम का चुनाव पूरी शक्ति से लड़ना चाह रही थी, मगर ममता ने यहां टीएमसी के उम्मीदवार उतार कर कांग्रेस की पूरी फील्डिंग बिगाड़ दी। कांग्रेस को बुरी हार मिली।
मुद्धों पर कांग्रेस का साथ नहीं:
कांग्रेस लोकसभा व राज्यसभा में मुख्य विपक्षी दल है। मगर अनेक मसलों पर टीएमसी, सपा, आप,एनसीपी आदि ने उससे अलग रुख रखा। राहुल गांधी ने मतदाता सूची के गहन परीक्षण की बात आते ही वोट चोरी का मुद्दा जोर शोर से उठाया, मगर टीएमसी उससे अलग रही। उसका कहना था कि सत्ता से बारबार बेमतलब की टकराहट ठीक नहीं। उपराष्ट्रपति के खिलाफ प्रस्ताव, लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव आदि मुद्धों पर भी विपक्ष के अन्य दलों ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया। वो अकेले लड़ती रही। अब राहुल के उठाये मुद्धों को ही टीएमसी अपनी हार की वजह बता रही है, फिर उस समय कांग्रेस का साथ क्यों नहीं दिया।
हार के बाद ' इंडिया ' याद आया:
विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद अब ममता ने कहा है कि वो इंडिया गठबन्धन का हिस्सा है। सोनिया गांधी, राहुल, अखिलेश, केजरीवाल, तेजस्वी आदि ने उनसे फोन पर बात की है। वे मेरे साथ है। यही रुख चुनाव में रखना चाहिए था ना।

अब फिर से गठबंधन पर मंथन:
दिल्ली में आप, बंगाल में टीएमसी व असम में कांग्रेस की हार के बाद एक बार फिर से इंडिया गठबन्धन के दलों को अपनी नीतियों पर मंथन करना पड़ेगा। नहीं तो उनके लिए भाजपा को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा।

