कुत्ते का मुखौटा पहन कलेक्ट्रेट पहुंचा युवक, भौंकते हुए बोला- ‘साहब! मेरी नसबंदी तो करा दीजिए’!
Rudra News Express National Desk. Khandwa.
खंडवा कलेक्ट्रेट में मंगलवार को जनसुनवाई चल रही थी। अधिकारी लोगों की शिकायतें सुन रहे थे और फरियादी अपनी समस्याएं लेकर पहुंच रहे थे। तभी अचानक एक युवक कुत्ते का मुखौटा और पोशाक पहनकर वहां पहुंचा। कुछ पल के लिए लोग समझ ही नहीं पाए कि आखिर माजरा क्या है। युवक ने कुत्ते जैसी आवाजें निकालनी शुरू कीं तो वहां मौजूद लोगों की नजरें उसकी तरफ टिक गईं।
यह कोई मजाक या मनोरंजन नहीं था, बल्कि खंडवा में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक के खिलाफ किया गया अनोखा विरोध प्रदर्शन था। नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष दीपक ‘मुल्लू’ राठौर के साथ पहुंचे युवक ने कुत्ते का रूप धारण कर प्रशासन को शहर की उस समस्या की याद दिलाई, जिससे हजारों लोग परेशान होने का दावा किया जा रहा है।
40 लाख खर्च, फिर भी सड़क पर कुत्तों का राज? :
प्रदर्शनकारियों ने नगर निगम की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि आवारा कुत्तों की नसबंदी के लिए करीब 40 लाख रुपए खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन शहर की सड़कों पर कुत्तों की संख्या कम होने के बजाय समस्या लगातार बनी हुई है।
प्रदर्शनकारियों का दावा है कि शहर में 13 हजार से ज्यादा डॉग बाइट के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में सवाल उठाया गया कि अगर नसबंदी अभियान पर लाखों रुपए खर्च हुए हैं तो उसका असर जमीन पर क्यों दिखाई नहीं दे रहा?
‘कागजों में हो रही नसबंदी!’
नेता प्रतिपक्ष और प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि नसबंदी के नाम पर मिलने वाले फंड का सही इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। उनका आरोप है कि कुत्तों की नसबंदी का काम प्रभावी ढंग से जमीन पर नजर नहीं आ रहा और कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है।
कुत्ते की पोशाक पहने युवक का संदेश साफ था—जब इंसानों की शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा तो क्यों न कुत्ता बनकर ही प्रशासन को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाई जाए।
ज्ञापन देकर कहा- खतरनाक कुत्तों पर लगाम लगाएं :
प्रदर्शनकारियों ने जनसुनवाई में ज्ञापन सौंपकर आवारा और खतरनाक कुत्तों पर प्रभावी नियंत्रण की मांग की। उन्होंने नसबंदी अभियान में हुए खर्च और उसके परिणामों की जांच की मांग भी उठाई।
इस अनोखे प्रदर्शन ने जनसुनवाई में मौजूद लोगों का ध्यान जरूर खींच लिया, लेकिन इसके पीछे उठाया गया सवाल गंभीर है—अगर लाखों रुपए खर्च होने के बाद भी आवारा कुत्तों का आतंक कम नहीं हुआ, तो आखिर नसबंदी अभियान का फायदा किसे मिला?

