फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र से जमीन नामांतरण का आरोप, खुद को जिंदा साबित करने में लगा दशक
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कल्पना करिये, कोई जिंदा है, लेकिन उसे खुद को जिंदा साबित करने की जेहमत उठानी पड़े। मैं जीवित हूं यह प्रमाणित करने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हों तो कितनी तकलीफ होती होगी।
ऐसी तकलीफ बेमेतरा, छत्तीसगढ़ के 80 वर्षीय शैल शर्मा को कई सालों तक झेलनी पड़ी है। शैल को 34 साल पहले सरकारी कागजों में मृत घोषित कर दिया गया और उन्हें खुद को जिंदा साबित करने में एक दशक तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने पड़े।
1993 में उनके नाम से एक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी हुआ। उन्हें इस ' मौत ' की जानकारी तब हुई जब संपत्ति से जुड़े दस्तावेजों में उनका अस्तित्व ही समाप्त पाया गया।
उनका आरोप है कि फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र के आधार पर उनकी बहू रंजना शर्मा ने मध्यप्रदेश स्थित 30 डिसमिल भूमि का नामांतरण अपने और अपनी पुत्री के नाम पर करा लिया। जो उनके पति के नाम पर दर्ज थी।


