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महाराष्ट्र के एक आदेश ने फिर जले पर छिड़क दिया नमक, हम राजस्थानी अपनी जुबान पर लगा ताला कब खोलेंगे

मराठी, कन्नड़, पंजाबी, बंगाली की तरह राजस्थानी कब सोचना शुरू करेगा ?
भाषा नहीं बची तो संस्कृति भी नहीं बचेगी।
 

मधु आचार्य ' आशावादी '
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RNE Special.
 

हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश निकाला कि कक्षा 1 से 10 तक हर स्कूल में बच्चों को मराठी भाषा पढ़ाना अनिवार्य होगा। इस भाषा की परीक्षा भी ली जाएगी। यदि कोई स्कूल यह काम नहीं करेगा तो उस पर 1 लाख का जुर्माना लगाया जायेगा। उस स्कूल की मान्यता तक को भी रद्द किया जा सकता है। यह आदेश महाराष्ट्र की सभी सरकारी व निजी स्कूलों के लिए लागू किया गया है।

अपनी मातृभाषा को लेकर किसी भी राज्य की सरकार ने इससे पहले इस तरह का सख्त आदेश कभी लागू नहीं किया है। मातृभाषा की रक्षा व उसके सम्मान के लिए इस तरह की व्यवस्था करने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य बना है। 
 

एक अर्थों में मातृभाषा की रक्षा के लिए महाराष्ट्र सरकार के इस तरह के आदेश की सराहना की जानी चाहिए। इस निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए। क्योंकि यदि किसी भी इंसान की मातृभाषा नहीं बचती है तो उसकी संस्कृति भी नहीं बचती है। संस्कृति नहीं बचेगी तो फिर इंसान कैसे बचेगा ? महाराष्ट्र की तरह ही बंगाल ने बंगाली, कर्नाटक ने कन्नड़, तमिलनाडु ने तमिल, केरल ने मलयालम, पंजाब ने पंजाबी भाषा की रक्षा की है।

इन राज्यों के राजनेताओं व जनता को अपनी मातृभाषा के महत्त्व का पता है। उनको इस बात का इल्म है कि मातृभाषा बचेगी तभी उनके युवाओं को रोजगार मिलेगा। उद्योग व व्यापार का विकास होगा। राज्य के व्यक्ति की पहचान बची रहेगी। इस कारण ही इन राज्यों में भाषा व संस्कृति को लेकर कभी भी धुर राजनीतिक विरोधी दल अलग अलग राह नहीं चलते, साथ रहते हैं। अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी अस्मिता के लिए सभी राजनीतिक दल इन राज्यों में एक है। इस कारण ही वहां की मातृभाषा से हर व्यक्ति का गहरा और आत्मिक जुड़ाव है।

महाराष्ट्र के आदेश ने दर्द जगाया:

महाराष्ट्र के आदेश ने ऐसा लगा जैसे हम राजस्थानियों के दर्द को फिर जगा दिया। हम 12 करोड़ राजस्थानी पिछले 6 दशक से भी अधिक समय से अपनी मातृभाषा राजस्थानी की मान्यता की लड़ाई लड़ रहे हैं। तीन पीढ़ियां खप गयी जो कह रही है कि ' म्हारी जुबान रो ताळो खोलो '। मगर सरकार सुन ही नहीं रही। 

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राज्य के 25 लोकसभा सांसद हैं, 10 राज्यसभा सांसद हैं और 200 विधायक हैं, फिर भी राजस्थानियों की नहीं सुनी जा रही। राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं मिल रही, दूसरी राजभाषा का दर्जा नहीं मिल रहा। ऐसा नहीं है कि यह केवल इस राजनीतिक दल के सरकार में होने पर हो रहा है, पहले दूसरे दल की भी सरकार थी। उसने भी राजस्थानियों की राजस्थानी की बात को नहीं सुना। गंभीरता से नहीं लिया। 
 

सत्ताओं ने 12 करोड़ लोगों की भावना को भी तरजीह नहीं दी। यह कमी हमारे जन प्रतिनिधियों की है। जब सांसद व विधायक के लिए नेता चुनाव लड़ने जाते हैं, तब अपने क्षेत्र में वोट राजस्थानी में मांगते हैं। अपनी बात राजस्थानी में कहते हैं मगर कभी भी एक होकर राज या सत्ता के सामने एकजुट होकर अपनी मातृभाषा राजस्थानी को मान्यता देने, दूसरी राजभाषा बनाने की मांग नहीं करते। 
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शिकायत को लोगों से भी है, वे भी तो अपने जन प्रतिनिधियों को इस बात के लिए मजबूर नहीं करते कि वे उनकी भाषा को मान्यता देने की बात करे। यदि लोग मजबूर करने लग जाएं महाराष्ट्र, बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु की तरह, तो इनको को बाध्य होकर अपने राजनीतिक दल के मुखियाओं को राजस्थानी की मान्यता की बात कहनी पड़ेगी। महाराष्ट्र सरकार के इस नए आदेश के बाद राजस्थान के जन प्रतिनिधियों, राज्य व केंद्र सरकार को व आम जनता को सोचना चाहिए। ठोस कदम निर्णयात्मक लेना चाहिए।

हम राजस्थानी कब बोलेंगे ?

महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक की तरह अब हम राजस्थानियों को भी नेताओं का भरोसा छोड़कर खुद ही अपनी बात को बोलना होगा। अपनी जुबान पर लगे ताले को खोलने के प्रयास करने होंगे। हम सभी को यह समझना होगा कि भाषा की मान्यता से हमारे बच्चों का भविष्य जुड़ा हुआ है। हमारा व्यापार जुड़ा हुआ है। हमारी पहचान जुड़ी हुई है।

 

सबसे बड़ी बात है हमारी आने वाली पीढ़ी का भविष्य। यदि हमारी मातृभाषा राजस्थानी को मान्यता मिलती है तो चपरासी से लेकर आरएएस तक की प्रतियोगी परीक्षा में हमारे बच्चों को फायदा होगा। 20 अंकों के प्रश्न केवल राजस्थानी ही हल कर सकेगा। इस हालत में राजस्थान बाहर के राज्यों से आये हुए लोगों के लिए रोजगार की दृष्टि से चारागाह नहीं बनेगा। हमारे बच्चों को अधिक रोजगार मिलेगा। 
 

यदि इस दौर के लोगों ने राजस्थानी भाषा की मान्यता का हक हासिल नहीं किया तो आने वाली पीढी हमें माफ नहीं करेगी। हम उसके गुनहगार बनेंगे। 

कोर्ट के आदेश से उम्मीद:

हाल ही में कोर्ट ने राजस्थानी भाषा में प्राथमिक शिक्षा को लेकर जो आदेश दिया है, उससे कुछ उम्मीद जगी है। मगर भूखे को तो सीधे रोटी मिले तब भूख शांत होती है। सरकार अब कोर्ट के आदेश को किस तरह रिएक्ट करती है, लागू करने की बात करती है, यह सामने आए तब उम्मीद का सही परीक्षण कर सकेंगे। 

हे माननीयों सोचो !

महाराष्ट्र सरकार के इस आदेश के बाद हमारे भी सभी 25 लोकसभा सदस्यों, 10 राज्यसभा सदस्यों व 200 विधायकों को सोचना चाहिए। राज्य के मुख्यमंत्री जी को भी इस विषय में गम्भीर होना चाहिए। उनको अपने स्तर का जो काम है, राजस्थानी को दूसरी राजभाषा बनाने का, वह पहले पूरा करना चाहिए। फिर अपने प्रभाव का उपयोग कर अपनी और हमारी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलानी चाहिए। इतिहास उनको याद रखेगा। क्योंकि जीवित तो भाषा, संस्कृति व साहित्य ही रहता है।

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