राजस्थान दिवस तारीख से तिथि पर लाना पर्याप्त नहीं, राजस्थानी के बिना राजस्थान स्थापना दिवस सूना सूना सा
राजस्थान में राजस्थानी नहीं तो फिर कहां होगी यह भाषा
मधु आचार्य ' आशावादी "

RNE Network.
तीन दिन पहले अखबार में एक खबर पढ़ी थी। जिसमें महाराष्ट्र के मंत्री दादा भूसे ने कक्षा 1 से 10 तक के स्कूलों को सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी थी कि यदि स्कूल में मराठी भाषा को नहीं पढ़ाया गया तो उनकी संबद्धता समाप्त कर दी जायेगी। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संबद्धता समाप्त करने की बात मंत्री ने कही। साफ शब्दों में माना जाए तो यह कहा गया कि मराठी नहीं पढाने वाली स्कूलों को बंद कर दिया जायेगा। उन्होंने इसकी जांच की बात भी कही।

यह होता है अपनी मातृभाषा से प्रेम। मातृभाषा से प्रेम का अर्थ किसी अन्य भाषा का विरोध नहीं होता। यदि व्यक्ति अपनी मां, मां बोली और मातृ भूमि की इज्जत नहीं करता है तो वो व्यक्ति कहलाने का अधिकारी भी नहीं है। उस पर फिर कोई भी भरोसा नहीं कर सकता। मराठी, कन्नड़, बंगला, मलयालम, तमिल, पंजाबी आदि जिनकी मातृभाषा है, वे अपनी भाषा के लिए कितना समर्पित है यह देखने की बात है।
भाषा का अर्थ होता है संस्कृति की रक्षा। अपने क्षेत्र का विकास । अपनी भाषा के लोगों के लिए रोजगार। अपनी परंपराओं की रक्षा। अपने संस्कारों का संरक्षण। अपनी पहचान बनाना। यह सब काम केवल मातृभाषा ही कर सकती है।
दक्षिण के अनेक राज्यों में कई बार सत्ताएं भाषा के ही मुद्दे पर बदली है। अनेक राजनीतिक दलों का आधार भी मातृभाषा है। इन राज्यों में राष्ट्रीय दल हावी नहीं, क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व है। जिसका कारण भी वहां की मातृभाषा है।
तेलंगाना, आंध्रा, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि राज्यों में मातृभाषा का मुद्दा ही सर्वाधिक संवेदनशील है। उसके सामने सारे मुद्दे विफल है।
मातृभाषा और राजस्थान:
जब राज्यों का गठन हुआ तब उनका आधार भाषा भी थी। राजस्थान में भी राजस्थानी भाषा की प्रमुखता थी। उस समय यहां की राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिला। उसके अपने कारण है, जो सभी जानते है। मगर आजादी के बाद न तो राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता मिली और न ही इसे राज्य की दूसरी राजभाषा का दर्जा मिला। यहां के लोग इन दोनों बातों के लिए प्रदेश के गठन से मांग कर रहे है मगर राजनीतिक ईच्छा शक्ति के अभाव में 14 करोड़ लोगों को आज भी उनकी भाषा नहीं मिल सकी है। उनकी जुबान पर ताला लगा हुआ है।
राज्य की विधानसभा सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भिजवा चुकी है। फिर भी मान्यता नहीं मिली है। न राज्य की किसी भी दल की सरकार ने राजस्थानी को दूसरी राजभाषा बनाया है।

केवल तिथि पर आना पर्याप्त नहीं:
वर्तमान सरकार ने राजस्थान स्थापना दिवस के आयोजन को लेकर बड़ा परिवर्तन किया है। अब तक यह 30 मार्च को मनाया जाता रहा है। मगर इस बार यह 19 मार्च को मनाया जायेगा। जिसके आयोजन भी आरम्भ हो गए है।
19 मार्च को इसलिए मनाया जा रहा है क्योंकि इस दिन से भारतीय नव वर्ष की स्थापना शुरू होनी है। चैत्र नवरात्रा आरम्भ होगी। अर्थ यह है कि अब तारीख से नहीं चैत्र नवरात्रा के आरम्भ के दिन को राजस्थान स्थापना दिवस के रूप में मनाया जायेगा।

तारीख से तिथि पर आना, गलत नही। अपनी संस्कृति से जुड़ना है। मगर दुनिया में वही संस्कृति जिंदा रही है जिसकी भाषा बची रही है। यदि हम अपने राजस्थान की संस्कृति को जिंदा रखना है, बचाना है तो हमें पहले राजस्थानी भाषा को बचाना होगा। भाषा तब बचेगी जब हम इसे संवैधानिक मान्यता देंगे। दूसरी राजभाषा बनायेंगे। इस कारण तारीख से तिथि पर आने के साथ राजस्थानी की मान्यता व दूसरी राजभाषा की अनिवार्यता को भी पूरा करना चाहिए। यह अच्छा अवसर है।
पहले राजस्थानी भाषा जरूरी:
राजस्थानी भाषा के बिना राजस्थान स्थापना दिवस सूना सूना सा लगेगा। दूसरी राजभाषा घोषित करना तो सरकार के हाथ में है, यह तो इस स्थापना दिवस पर तोहफा दे देना चाहिए। इसके अलावा इस बार शिक्षा सत्र 1 अप्रैल से आरम्भ हो रहा है।
नई शिक्षा नीति में स्पष्ट लिखा है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए। यह नीति नये शिक्षा सत्र से लागू कर देनी चाहिए। प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों के पद सृजित करने व पढ़ाने की घोषणा इस सरकार का ऐतिहासिक कार्य होगा।
एक अवसर है, चूकना न हो:
जब राजस्थान स्थापना दिवस को लेकर सीएम भजनलाल जी शर्मा ने नवाचार किया है तो उनको यह ऐतिहासिक कदम भी उठाना चाहिए। इतिहास में उनका यह काम दर्ज होगा। अनेक किताबों, आलेखों व दस्तावेजों में उनका, उनकी सरकार का व उनके दल का नाम दर्ज होगा। प्रदेश का बुद्धिजीवी तबका सदा उनका सम्मान करेगा। मत चूके चौहान.... इस स्थापना दिवस के अवसर पर 14 करोड़ लोगों को यह सौगात दी जा सकती है।

