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जनरंजन : भंवर सिंह सामौर थे राजस्थानी के एनसाइक्लोपीडिया, राजस्थानी भाषा, साहित्य के संरक्षण में सामौर का बड़ा योगदान, 12 करोड़ लोगों की भाषा की अब तो सुध लो सरकार!

 

राजस्थानी भाषा और साहित्य के जो बड़े स्तंभ है, उनमें से एक थे भंवर सिंह सामौर। शुक्रवार को मायड़ भाषा के इस सपूत का असामयिक निधन हो गया। उनके निधन ने हर राजस्थानी भाषा के हिमायती, लेखक, कलाकार दुखी है। क्योंकि अपनी मातृभाषा के लिए लड़ने व पूरा जीवन झोंकने वाले लोग बहुत कम होते हैं। सामौर साब ने राजस्थानी को ओढ़ा, बिछाया, गाया, जिया और अंतिम सांस तक उसके लिए समर्पित रहे। उनका जाना राजस्थानी के लिए अपूरणीय क्षति है।
 


 

मधु आचार्य ' आशावादी '

देश विदेश में 12 करोड़ से अधिक लोग राजस्थानी भाषा बोलते हैं, क्योंकि ये उनकी मातृभाषा है। आजादी के बाद से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने की मांग इस प्रदेश के लोग कर रहे हैं। बाद में इसे राजस्थान की दूसरी राज भाषा बनाने का आग्रह भी अपने ही प्रदेश सरकार से किया, मगर उनकी नहीं सुनी गई। आज छत्तीसगढ़ में विधायक अपनी शपथ बिना मान्यता के भी अपनी भाषा में ले सकते हैं, मगर राजस्थान का कोई भी विधायक अपनी मातृभाषा राजस्थानी में नहीं ले सकता। तीन पीढियां अपनी भाषा के मान के लिए संघर्ष करते करते खप गई, मगर किसी भी दल की सरकार ने उसे नहीं सुना। गये शुक्रवार को अपनी मातृभाषा की मान्यता की मांग करते करते प्रदेश वासियों ने अपने भाषा और साहित्य के मनीषी भंवर सिंह सामौर को भी खो दिया, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी राजस्थानी के लिए समर्पित की हुई थी।

 

एक बार जब राज्य में अशोक गहलोत की सरकार थी 2013 में, तब विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भिजवाया, उस समय केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्त्व में यूपीए की सरकार थी, मगर अब भी केंद्र ने उस पर निर्णय नहीं किया है। क्योंकि राजस्थानी लोग गांधीवादी हैं, उसी तरीके से अब तक आंदोलन करते रहे हैं। उसी भाषा मान्यता आंदोलन के हरावल थे भंवर सिंह सामौर।
 

अपनी युवावस्था से अभी बुजुर्गावस्था तक सामौर अपनी भाषा की मान्यता के लिए संघर्ष करते रहे। भाषा की मान्यता की मांग के हर आयोजन में निः स्वार्थ भाव से पहुंचते रहे। एक तरफ वे राजस्थानी में साहित्य रचते रहे तो दूसरी तरफ भाषा मान्यता के लिए भी संघर्ष करते रहे। उनके श्रम की बदौलत ही आज पूरे प्रदेश में राजस्थानी में लिखने वाले, भाषा मान्यता की बात करने वाले उनके अनगिनत शिष्य है। जिनमें से एक मैं भी हूं।उनका जाना कई भाषा प्रेमियों व राजस्थानी रचनाकारों को बेसहारा कर गया।



चलते फिरते एनसाइक्लोपीडिया थे सामौर

भंवर सिंह सामौर राजस्थानी भाषा व साहित्य के चलते फिरते एनसाइक्लोपीडिया थे। प्रदेश से कोई भी रचनाकार जब चाहे उनको फोन लगाता और किसी शब्द का अर्थ पूछता या हिंदी के शब्द की जगह राजस्थानी का शब्द पूछता तो तुरन्त ही बताते। इतना ही नहीं उस शब्द के बनने, उससे जुड़ी उक्ति व उसके दर्शन को भी बता देते, ताकि पूछने वाला जिंदगी में कभी भी उस शब्द को न भूले और दूसरों को भी उसके बारे में आसानी से बताए।
प्रदेश की अलग अलग जातियों के उदय, राजघरानों की पृष्ठभूमि और इन सबके आपसी संबंधों का इतिहास उन्हें कंठस्थ था। राजस्थानी को लेकर पूछे जाने वाले हर सवाल का जवाब यदि प्रदेश में किसी के पास था तो वे भंवर सिंह सामौर थे।



लोक के सबसे बड़े ज्ञाता

राजस्थानी के लोक व बात साहित्य के बारे में उनके पास अद्वितीय जानकारी थी। गजब का अध्ययन व याददाश्त। लोक कथाओं पर विजय दान देथा ने बड़ा काम किया, मगर समूचे लोक साहित्य पर सामौर का उल्लेखनीय काम था। उनको राजस्थानी की अनगिनत कहावतें, लोकोक्तियां कंठस्थ थी। साथ ही उनसे जुड़ी कथाओं की भी पूरी जानकारी थी। स्व विजयदान देथा भी उनसे कई बार सत्संग करते थे, बिज्जी उनके ज्ञान की खूब कद्र करते थे।


उन्होंने राजस्थानी संस्कृति के अनूठे निबंधों की एक पुस्तक लिखी और उसी पर उन्हें साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का सर्वोच्च पुरस्कार भी मिला। यह पुस्तक हिंदी भाषा में भी अनुदित हुई है।


सामौर अच्छे प्रशासक भी थे। वे लोहिया कॉलेज, चूरू के प्रिंसिपल रहे। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य रहे। भाषा, लोक साहित्य, मध्यकालीन राजस्थानी साहित्य, भाषा विकास, बात साहित्य आदि के अधिकृत वक्ता थे।



सहज, सरल व्यक्तित्त्व था उनका

भंवर सिंह सामौर पर ही यह उक्ति सही बैठती है, फलदार वृक्ष सदा झुके हुए रहते हैं। वे जितने बड़े राजस्थानी के विद्वान थे, उतने ही सहज व सरल इंसान थे। आजादी के आंदोलन में राजस्थानी के जिन साहित्यकारों का योगदान था, उनकी अधिकृत जानकारी उनके पास थी। उस समय के काव्य पर उनकी विशेष पकड़ थी और वो काव्य भी उन्हें  कंठस्थ था। आजादी के आंदोलन में जिन राजस्थानी रचनाकारों का विशेष योगदान था, उनको सामने लाने का बड़ा काम भंवर सिंह सामौर ने किया। इतिहास उनके इस बड़े काम को कभी नहीं भूलेगा। 



अंतिम समय तक राजस्थानी की बात करते रहे

गए शुक्रवार को उनका निधन हुआ, उससे दो दिन पहले वे जयपुर में थे। राज्य सरकार ने राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में राजस्थानी विभाग शुरू किया था। वे वहां मौजूद थे और अपने सामने राजस्थानी की इस बड़ी उपलब्धि को घटित होते हुए देखकर बेहद खुश थे। राजस्थानी भाषा और साहित्य, सदा उनकी कमी का अहसास करता रहेगा।

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