जनरंजन : कांग्रेस की गुटबाजी ने बढ़ाई भाजपा की जिला प्रमुख की आस, डूडी की अनुपस्थिति से भाजपा का मोरल हाई, पहली बार चुनावी मैदान में डूडी परिवार
बीकानेर के पंचायत राज चुनाव इस बार बहुत रोचक बन गए हैं। 30 साल बाद पहली बार चुनाव में स्व रामेश्वर डूडी का जलवा नहीं दिखेगा। नहीं तो एक तरफ डूडी व दूसरी तरफ बाकी नेता हुआ करते थे। यह स्थित कांग्रेस व विपक्ष के मध्य ही नहीं अपितु कांग्रेस के भीतर भी रहती थी। इस बार इस तरह का कोई करिश्माई नेता न तो कांग्रेस में है और न भाजपा में। इस वजह से ही चुनाव रोचक बन रहा है।
मधु आचार्य ' आशावादी '
पंचायत राज चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। उसके साथ ही कांग्रेस ने भी पूरे जोश के साथ अपने चुनावी प्रचार का आगाज कर दिया है। स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा की तरफ से तो सीएम भजनलाल शर्मा सहित बड़े नेता चुनाव प्रचार के लिए मैदान में उतरे थे, मगर कांग्रेस की तरफ से कोई बड़ा नेता वोट मांगने के लिए नहीं निकला। कांग्रेस इसी वजह से राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ जो असंतोष था, उसे भुना नहीं सकी।

इस बार कांग्रेस ने वो गलती नहीं की। किसान केसरी स्व रामेश्वर डूडी की प्रथम पुण्यतिथि पर हुई श्रद्धांजलि सभा पंचायत राज चुनावी सभा मे ही तब्दील हो गयी थी। उस सभा में पीसीसी चीफ गोविंद डोटासरा व नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जुली ने भाग लिया और एक तरह से राज्य में पंचायत चुनाव अभियान का आगाज किया। अब कल पूर्व सीएम अशोक गहलोत बीकानेर पहुंचे और नाल में चुनावी सभा की। वे श्रीडूंगरगढ़ में भी सभा करने वाले थे, मगर उनको दिल्ली जाना पड़ा। ये भी पंचायत राज चुनाव का ही प्रचार अभियान ही होता।

हालांकि गहलोत की इन चुनावी सभाओं से कांग्रेस की गुटबाजी भी उभर कर सामने आ गयी है। गहलोत की सभाएं उनके समर्थक पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल के क्षेत्र नाल, खाजूवाला व उनके ही समर्थक पूर्व विधायक मंगलाराम गोदारा के क्षेत्र में ही होने थे। वर्तमान में बीकानेर में सीधी टकराहट डूडी समर्थकों व गोविंद मेघवाल के बीच है। गहलोत इस कारण ही मेघवाल के पक्ष में सभा करने आये हैं।
भाजपा को इस बार बड़ी आस
दिग्गज नेता रामेश्वर डूडी के असामयिक देहावसान के कारण बीकानेर की ग्रामीण राजनीति में आई रिक्तता ने इस बार भाजपा की सफलता की आस को बढ़ा दिया है। डूडी थे तब तक तो भाजपा जिला प्रमुख के लिए मैदान में उतरते हुए ही झिझकती थी। एक बार तो जब मानिक चंद सुराना देहात भाजपा अध्यक्ष थे तब भाजपा को जिला परिषद में बहुमत भी मिल गया, मगर भाजपा में तोड़ फोड़ कर डूडी चुनाव जीत गये। इस बार भाजपा ने कुछ उम्मीद पाली है।
भाजपा की आस की एक वजह डूडी का न होना तो है ही, दूसरे कांग्रेस की तीव्र गुटबाजी से भी बड़ी उम्मीद जगी है। डूडी समर्थक व गोविंद मेघवाल आमने - सामने है और दोनों के बीच की खाई अभी तक भरी नहीं गयी है। चुनाव तक भरने की उम्मीद भी नहीं है। तीसरे भाजपा की राज्य में सरकार है। इन तीन कारणों से भाजपा को इस बार आस है कि वो जिला प्रमुख अपना बनाने में सफल हो जायेगी।

डोटासरा जुली, गहलोत भी मिटा नहीं सके हैं दूरियां
एक ऑडियो और वीडियो के कारण डूडी समर्थकों व मेघवाल के बीच जो दूरियां बनी, उसे प्रदेश कांग्रेस के नेता भी दूर नहीं कर पाए हैं। जमीनी स्तर पर देखें तो दूरियां कम होने के बजाय बढ़ी है। गहलोत के दौरे से खाई सार्वजनिक रूप से चौड़े जरूर आ गयी है। गहलोत की सभाएं केवल मेघवाल व मंगलाराम के विधानसभा क्षेत्रों में हुई है, जिनसे डूडी का शुरू से ही 36 का आंकड़ा रहा है। हालांकि गहलोत की नाल की सभा में नोखा विधायक सुशीला डूडी व शहर कांग्रेस अध्यक्ष मदन मेघवाल उपस्थित थे, मगर मन से नहीं दिखे। पंचायत चुनाव में इस दूरी का भी असर पड़ेगा। नाल की सभा में देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिसनाराम व डूडी के निकट के लोग नदारद थे। ये भी गुटबाजी को दर्शाते हैं।
एक नए गुट की उपस्थिति भी दिखने लगी है
प्रदेश स्तर पर कांग्रेस गहलोत व पायलट गुट में बंटी हुई तो साफ नजर आती ही है। मगर अब एक गुट गोविंद डोटासरा का भी है, यह भी अब साफ साफ नजर आने लगा है। देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिसनाराम सियाग को इसी गुट से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। यह इस बात से परिलक्षित होता है कि पूर्व सीएम अशोक गहलोत के दौरे की सूचना देहात कांग्रेस ने नहीं गोविंद मेघवाल ने दी। पीसी की व्यवस्था देहात कांग्रेस ने नहीं, पूर्व मंत्री व गहलोत के निकटस्थ डॉ बी डी कल्ला ने दी। यह सब दर्शाता है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक तो नहीं है। गुटबाजी हावी है और उसका असर चुनाव पर जरूर पड़ेगा।
डूडी परिवार भी पहली बार मैदान में
जब तक राजनीति में रामेश्वर डूडी सक्रिय थे, तब तक उनके परिवार का कोई सदस्य सीधे राजनीति में नहीं उतरा। न पार्टी में पदधिकारी बना और न ही कोई चुनाव लड़ा। यह भी पहली बार देखने को मिला है कि डूडी परिवार से अब तो तीन लोग राजनीति में उतर आए हैं। उनकी पत्नी सुशीला डूडी नोखा से विधायक है ही। वहीं उनके छोटे भाई की पत्नी व पुत्रवधु ने भी जिला परिषद के लिए नामांकन दाखिल किया था, मगर उनको पार्टी ने टिकट नहीं दिया।

जिला प्रमुख सामान्य महिला की सीट है तो यह माना जा रहा है कि ये भी इस पद की दावेदार है। पार्टी ने डूडी की पुत्रवधू को टिकट दे दिया है, जबकि भाई की पत्नी को नहीं दिया है। डूडी गुट के भीतर की कलह का भी इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। कांग्रेस के भीतर की इन स्थितियों के कारण ही भाजपा को इस बार आस जगी है।

