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जनरंजन : Sachin Pilot अध्यक्ष बने तो दमदार डोटासरा भी पाएंगे बड़ा पद! "चौथी बार गहलोत सरकार" नारों के पीछे क्या !

पंचायत चुनाव के बाद राजस्थान कांग्रेस में बदलेगी कमान, पायलट के सिर होगा ताज ?
 
डोटासरा की नई भूमिका क्या होगी, कद बढ़ेगा! अशोक गहलोत को खाली तो नहीं रखा जा सकता!

 

 

 

 

मधु आचार्य ' आशावादी '

राजस्थान कांग्रेस के बड़े नेताओं के सामने इस इस समय कई फ्रंट पर एक साथ खुले हैं। पंचायत चुनाव जहां दिखने वाला फ्रंट है  वहीं "वोट चोर गद्दी छोड़" वाली राहुल गांधी की गौरिल्ला लड़ाई हर दिन सुबह कोई न कोई टास्क दे देती है। इसी में से एक फ्रंट रितु बराला के नाम से FIR करवाने का भी खुल गया जिसके लिए पूरी कांग्रेस रात-दिन "थाने" में बैठी-सोई। 

दिखने वाले इन मोर्चों के साथ एक नहीं दिखने वाले फ्रंट की भी सुगबुगाहट है वह है पार्टी नेतृत्व में बदलाव। जानकारों का मानना का है पंचायत चुनाव के बाद राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष बदलना लगभग तय है। इसके साथ एक बार फिर नजरें सचिन पायलट की ओर उठ रही है। उन्हें लगातार मिल रही बड़ी जिम्मेदारियां यही इशारा कर रही है। ऐसे में अगर पायलट को कप्तान बनाया जाता है तो दमदार परफॉर्मेंस वाले डोटासरा को भी हाशिये पर नहीं भेजा जा सकता। तय है कि उन्हें भी राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका मिलेगी। 

इन सबके बीच एक बार फिर अशोक गहलोत के बयान और कार्यक्रम भी कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं। गहलोत ने रितु बराला से मुलाकात में "नसीहत" के बहाने एक बार फिर "रगड़ाई" शब्द उछाला हैं। पंचायत चुनाव को लेकर समर्थक नेताओं के जरिए सभाएं भी शुरू की हैं। "चौथी बार गहलोत सरकार" के नारे पर "गलतफहमी" वाली हिदायत भी उनकी ओर से आई है। ये संकेत बताते हैं कि अंदरखाने कुछ नया और बड़ा पक रहा है। संकेत इसलिए क्योंकि जब-जब बदलाव का अंदेशा होता है कुछ इसी तरह गहलोत की लोकप्रियता वाला कार्ड तेजी से चलता है। 

राजस्थान कांग्रेस में कमान बदलने की चर्चा डेढ़ साल पहले शुरू हो गयी लेकिन किसी न किसी वजह से अंजाम तक नहीं पहुंची। बदलाव की वजह वर्तमान पार्टी अध्यक्ष गोविंद डोटासरा की विफलता नहीं थी, राहुल गांधी उनके कामकाज से बहुत खुश हैं। जब राहुल अजमेर दौरे पर आए तो सार्वजनिक रूप से उन्होंने डोटासरा व नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जुली के काम की तारीफ की। उन्होंने दोनों की कैमेस्ट्री का उदाहरण अन्य राज्यों को भी अपने बयान से दिया।

इसके बावजूद राज्य कांग्रेस की कमान को बदलने की बात भी सत्य है। डोटासरा की पार्टी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में लगातार लंबी पारी हो गयी। पार्टी के संविधान के अनुसार अब हाईकमान को बदलाव करना ही पड़ेगा। राहुल ने कई बार इस बात के संकेत दिए हैं कि वे अब डोटासरा को कोई दूसरी बड़ी जिम्मेवारी देना चाहते हैं। जिसमें किसी राज्य का प्रभारी भी बनाये जाने तक की बात चर्चा में है। हालांकि अभी कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर राज्यों के प्रभारी बदले, उनमें डोटासरा का नाम नहीं था। इतना तय है कि पार्टी नेतृत्त्व डोटासरा के काम से खुश है और कोई जिम्मेवारी जरूर देगा।

प्रदेश कांग्रेस की कमान को लेकर गहलोत व पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट के बीच खींचतान है। पायलट को जब जब प्रदेश की कमान देने की बात जोर पकड़ती है, तब तब गहलोत मानेसर प्रकरण छेड़कर मामले को विवादास्पद बना देते हैं। उससे एकबारगी तो बात टल जाती है। इसके विपरीत पायलट का कद जरूर हाईकमान बढा देता है। 

इस बार जब गहलोत ने मानेसर राग अलापा तो पार्टी ने उनको चुनावी राज्य पंजाब का प्रभारी बनाकर यकायक कद बढ़ा दिया। वे पार्टी स्टार कम्पेनर तो है ही। इस प्रक्रिया में गहलोत के हाथ कोई जिम्मेवारी नहीं लगी, वे खाली रह गए।

पिछले डेढ़ साल के राजनीतिक घटनाक्रम से तो यही लगता है कि हाईकमान पायलट को अब राज्य कांग्रेस की कमान सौंपना चाहता है। क्योंकि अब पार्टी को अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी भी करनी है। इस वजह से अब तो राजनीतिक गलियारों में यह तय माना जा रहा है कि पंचायत राज चुनाव समाप्त होते ही राज्य कांग्रेस में बदलाव की लिखी हुई स्क्रिप्ट को अमलीजामा मिल जायेगा। क्योंकि 2 साल बाद तो राज्य में विधानसभा के चुनाव होने ही है।

पायलट के सिर होगा ताज, या कोई और......

बदलाव की इस कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है कि राज्य कांग्रेस का ताज आखिर किसके सिर पर रखा जायेगा। पायलट को कमान देकर उनकी पिछली सरकार के समय की भरपाई की जाएगी या किसी और को आगे किया जायेगा। उसके व पायलट के नेतृत्त्व में अगला चुनाव लड़ा जायेगा। 


दरअसल पिछली कांग्रेस सरकार के समय पायलट ने सीएम अशोक गहलोत को चुनोती दी थी और सरकार के नेतृत्त्व परिवर्तन की मांग की थी। एक लंबी लड़ाई गहलोत - पायलट गुट में हुई, जो अब भी बदस्तूर जारी है। पार्टी ने फिर एक अंतराल के बाद पायलट को कमान देने की बात को स्वीकार लिया और विधायक दल की बैठक बुला ली। तब गहलोत व उनके समर्थक विधायकों ने बगावत कर हाईकमान को ही चुनोती दे डाली, जिसके लिए बाद में गहलोत को सोनिया गांधी के सामने खेद प्रकट करना पड़ा। मगर हाईकमान को इस बात का मलाल था कि वो पायलट को नेतृत्त्व नहीं दे सके। तब उसकी एवज में पायलट को सीडब्ल्यूसी का सदस्य व राष्ट्रीय महासचिव बनाया, छतीसगढ़ का प्रभारी बना उनका कद बढ़ाया। हाईकमान अपने उस समय के वादे को पूरा कर पायलट को इस बार राज्य की कमान दे सकता है। कर्नाटक में डी के शिवकुमार को इसी तरह ही नेतृत्त्व हाईकमान ने दिया है।

डोटासरा की नई भूमिका क्या ?

राहुल गांधी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद डोटासरा के कामकाज से काफी प्रसन्न है। उनके अध्यक्ष रहते हुए ही लोकसभा चुनाव में पार्टी व इंडिया गठबंधन ने 25 में से 11 सीटें जीती। जबकि इससे पहले के दो लोकसभा चुनाव में पार्टी राज्य में लोकसभा की एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। विधानसभा चुनाव में भी डोटासरा के रहते हुए पार्टी ने 70 से अधिक सीटें जीती। डोटासरा ने संगठन सृजन अभियान को भी राहुल के मानदंडों के अनुरूप पूरा करके दिखाया।


विधानसभा में भाजपा सरकार व उनके मंत्रियों को घेरने में भी डोटासरा का कोई सानी नहीं रहा है। डोटासरा व जुली ने सदन में अपने आक्रामक हमलों से अनेक बार सरकार को बैकफुट पर लाने का काम किया है। इस कारण यह तो तय है कि अध्यक्ष के रूप में लम्बा समय हो जाने के कारण उनको बदला जाएगा, मगर इससे बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी, यह भी तय है।

गहलोत की भूमिका क्या रहेगी ?

कांग्रेस कार्यकर्ताओं व राजनीतिक विश्लेषकों के दिमाग मे सबसे बड़ा सवाल यही है कि पूर्व सीएम अशोक गहलोत का क्या होगा, उनको कौनसी जिम्मेवारी मिलेगी। क्योंकि उनके जैसे वरिष्ठ नेता को पार्टी छोड़ना भी नहीं चाहेगी। राज्य में बड़ी जिम्मेवारी को देकर गुटबाजी को भी बढाना नहीं चाहेगी। उन्होंने व उनके समर्थक विधायकों ने हाईकमान को जो चुनोती एक समय में दी थी, उसे पार्टी आसानी से भूल भी नहीं सकती। क्योंकि उसके बाद से ही गहलोत की दिल्ली में पकड़ कमजोर हुई है। उसी का परिणाम है कि अभी जब राज्यों के प्रभारी बनाये गए तो उनको तरजीह नहीं मिली। जबकि हरीश चौधरी, सचिन पायलट, भूपेश बघेल, मुकुल वासनिक, रणदीप सिंह सुरजेवाला आदि को महत्ती जिम्मेवारियां मिली।

गहलोत हाल की राज्य की राजनीतिक गतिविधियों पर भी हाईकमान की नजर है। कई बार उनकी गतिविधियों पर पीसीसी चीफ डोटासरा ने भी टिप्पणी की है। यह टिप्पणी इस कारण खास मानी जाती है क्योंकि बिना दिल्ली दरबार की सहमति के बड़े नेता पर कोई बोल नहीं सकता। उस पर भी वो नेता जो खुद एक समय में गहलोत गुट के प्रमुख नेताओं में था। इस तरह गहलोत की भूमिका पर भी आलाकमान को कुछ बड़ा निर्णय लेना है। उस निर्णय के बाद राजस्थान में कांग्रेस की कमान को तुरन्त बदला जायेगा। जिसकी उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

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