एक बार फिर ' मराठी ' पढ़ाने का कह जले पर नमक छिड़का, शिक्षा नीति का प्राथमिक भाषा में शिक्षा देने का ध्येय कहां गया ?
मधु आचार्य ' आशावादी '

RNE Special.
देश और दुनिया के अलग अलग हिस्सों में बसे 12 करोड़ से अधिक राजस्थानियों की मातृभाषा ' राजस्थानी ' है। वे इसी अपनी मां बोली को बोलते हैं और इसी में अपने विचारों की अभिव्यक्ति करते हैं। इसका मूल कारण यह है कि राजस्थानी भाषा के साथ राजस्थानियों की अस्मिता जुड़ी हुई है। उनकी पुरातन संस्कृति जुड़ी हुई है। उनकी मां ने इसी भाषा में सपने देखे थे और दिखाए थे। जिनकी ताबीर हुई थी।
राजस्थानी भाषा का इतिहास बहुत ही पुराना है। वेदों में भी इस भाषा का उल्लेख मिलता है। राजस्थान की संस्कृति से पूरी दुनिया अचंभित होती रही है। इस प्रदेश की भाषा और संस्कृति में इतना गहरा तालमेल है कि एक के कमजोर होने पर दूसरी स्वतः कमजोर हो जाती है। क्षेत्रीय भाषाओं में राजस्थानी ही अकेली ऐसी भाषा है, जिसका अपना विपुल साहित्य का भंडार है। इसका अपना शब्दकोश है। राजस्थानी को समृद्ध भाषा माना जाता है तभी तो देश की साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ने जिन 24 भारतीय भाषाओं को मान्यता दी उनमें एक राजस्थानी भी है।
लगभग 7 दशक से राजस्थानी लोग अपनी भाषा की जुबान पर लगे ताले को खोलने की मांग कर रहे हैं। मतलब, वे राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देकर संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। सत्ता की निष्ठुरता का आलम यह है कि तमाम शर्तें पूरी करने के बाद भी राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता नहीं मिली है। राज्य की सत्ता भी इस मामले में निष्ठुर रही है। राजस्थानी को दूसरी राजभाषा बनाने का काम तो राज्य का होता है, मगर यहां भी इसे दूसरी राजभाषा 75 साल में भी नहीं बनाया गया। 3 पीढ़ियां खप गई मान्यता की मांग करते करते, मगर निष्ठुरता सत्ताओं की टूटी ही नहीं।
एक आदेश ने फिर नमक छिड़का:
राज्यपाल सचिवालय, लोक भवन से एक पत्र राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलगुरु के नाम गया है। इस पत्र में उनके विश्वविद्यालय परिसर में शास्त्रीय मराठी भाषा अध्ययन के लिए केंद्र स्थापित करने को कहा गया है।
पत्र में बताया गया है कि माननीय राज्यपाल महोदय के समक्ष ' राजस्थान के समस्त विश्वविद्यालय परिसर में शास्त्रीय मराठी भाषा के अध्ययन केंद्र स्थापित करने के लिए अभ्यावेदन प्रस्तुत किया गया है। जिसके सम्बन्ध में माननीय राज्यपाल महोदय द्वारा राज्य के समस्त वित्त पोषित विश्वविद्यालयो में मराठी अध्ययन केंद्र स्थापित करने के निर्देश प्रदान किये जाते हैं।
इस सूचना से उखड़ गए राजस्थानी:
यह पत्र जैसे ही सार्वजनिक हुआ राजस्थानी उखड़ गए। क्योंकि नई शिक्षा नीति में स्पष्ट लिखा है कि बच्चों को उनकी प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए। मगर राज्य सरकार ने अभी तक भी शिक्षा नीति के इस बिंदु को लागू नहीं किया है।
राज्य के केवल 4 विश्वविद्यालयो में ही राजस्थानी विभाग है। उसे खोलने के लिए कभी भी राज्य सरकार ने सभी विश्वविद्यालयों को पाबंद नहीं किया। आरपीएससी में कुछ समय के लिए राजस्थान की मातृभाषा को महत्त्व मिला, मगर बाद में वो भी खत्म हो गया।
आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने भी अनेक बार अपने उद्बोधन में कहा है कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में ही पढ़ाया जाना चाहिए। ताकि वह जल्दी विकसित हो। अपनी संस्कृति से जुड़ा रहे। उसके संस्कार उसमें स्थापित रहे। मगर राजस्थान में उनकी बात को भी लागू नहीं किया गया।
दूसरी किसी भाषा से एतराज नहीं:
राजस्थान के हर आदमी के संस्कार दूसरे के सम्मान के है। कोई यदि अंग्रेजी, मराठी, बंगाली, हिंदी, तमिल आदि पढ़ना चाहे तो पढ़े, उसका विरोध नहीं है। इन भाषाओं का भी सम्मान है। मगर साथ ही राजस्थानी का भी पूरा सम्मान जरूरी है और वह मिल सकता है केवल संवैधानिक मान्यता और राज्य में दूसरी राजभाषा बनने से। इस बात को पूरा करें और उसके बाद चाहे जितनी भाषाओं को पढ़ाने के प्रबंध करें, एतराज नहीं।
मगर राजस्थानी की तो उपेक्षा हो, अन्य भाषाओं का सम्मान राज्य में हो, यह तो सहन करना सम्भव ही नहीं होता। राजस्थानी की कीमत पर कोई भाषा का महत्त्व स्वीकार नहीं, राजस्थानी के साथ हर भाषा का महत्त्व स्वीकार है।
इस बार मराठी केंद्रों का जो आदेश निकला है, उसको लेकर भी राजस्थानी लोगों का यही कहना है। पहले आप राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता दीजिये, दूसरी राजभाषा बनाइये, उसके बाद भले ही अन्य भाषाओं को तरजीह दीजिये, वो स्वीकार्य है।
माननीय कब बोलेंगे मां बोली के लिए ?
हर राजस्थानी के मन मे इस नए आदेश को लेकर एक सवाल स्वाभाविक रूप से निकला है, वह सवाल यह है कि आखिर हमारे माननीय कब अपनी मां बोली के लिए बोलेंगे। 25 लोकसभा सदस्य हैं, 10 राज्यसभा सदस्य हैं, 200 विधायक है, लोकसभा अध्यक्ष भी है, एक राज्य में राज्यपाल भी है, यह सब अपनी मातृभाषा की बात रखेंगे तो कोई इंकार कर ही नहीं सकता। मगर इन सभी माननीयों को बोलना तो पड़ेगा। इनकी चुप्पी 12 करोड़ लोगों पर असर डाल रही है, जो राजस्थानी बोलते हैं।
अभी नहीं तो कभी नहीं:
अभी मातृभाषा को लेकर राजस्थानियों के मन में कोमल भाव है, सत्ता को यह समझना चाहिए। इस समय अगर उन्होंने राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता दे दी, दूसरी राजभाषा बना दिया तो निश्चित वे उनके मन में सदा के लिए जगह बना लेंगे। ये अवसर राजस्थानियों के पास भी है, समय उचित है, एकजुट होकर अपनी बात रखनी चाहिए, सत्ता को बाध्य होना पड़ेगा। अभी माहौल अनुकूल है। इसलिए कह सकते हैं कि अभी नहीं तो कभी नहीं।

