...Devisingh Bhati के विजय रथ को लगभग रोक ही चुके थे रघुनाथ सिंह भाटी!
निधन : कांग्रेस नेता रघुनाथसिंह भाटी नहीं रहे, पूर्व मंत्री भंवरसिंह भाटी के पिता थे रघुनाथसिंह
Rudra News Express Kolayat-Bikaner.
"रघुनाथसिंह भाटी नहीं रहे!" यह दुखद खबर आज जब आई तो जानने वालों के जेहन में एक ऐसे राजनेता की तस्वीर उभरी जिनका अपना सौम्य व्यक्तित्व ही पहचान था। शांत, हलकी मुस्कान के साथ अडिग आत्मविश्वास उनके चेहरे से साफ झलकता था। लगता था हार-जीत उनके चेहरे के भावों और बोल-चाल की भाषा पर कोई असर नहीं छोड़ते।

ऐसे थे रघुनाथसिंह भाटी :
हाँ यहां उन्ही रघुनाथसिंह भाटी की बात हो रही जिनकी आज बड़ी पहचान भले ही पूर्व मंत्री भंवरसिंह भाटी के पिता के रूप में हो लेकिन जो लोग उन्हें जानते है वे यह भी मानते है कि भंवरसिंह भाटी की जीत में उनके पिता के सौम्य व्यक्तित्व का बड़ा असर है। यह भी माना जाता है कि खुद भंवरसिंह भाटी भी कमोबेश उसी सौम्यता के साथ आगे बढ़ते दिखते हैं। रघुनाथसिंह भाटी राजस्थान के वरिष्ठ कांग्रेस नेता थे और बीकानेर में वे प्रधान और उप जिला प्रमुख भी रहे। कांग्रेस में कई पदों पर रहे। इसके बावजूद रघुनाथसिंह की बड़ी ताकत की जब भी बात होती है तो उस चुनाव को लेकर होती है जिसे वो जीत नहीं सके लेकिन लगातार 05 चुनावों से जीत रहे देवीसिंह भाटी के विजय रथ के पहिये लगभग रोक ही दिए । रघुनाथसिंह भाटी ने पहली बार यह अहसास करवाया कि कोलायत में देवीसिंह भाटी को भी चुनाव हराया जा सकता है। बाद में इसी को फलीभूत किया खुद उनके बेटे भंवरसिंह भाटी ने जो लगातार दो चुनाव जीते और मंत्री बने।

जब देवीसिंह भाटी को चुनौती देने वाला कोई नहीं था :
कोलायत की राजनीति की बात 1980 से अब तक देवीसिंह भाटी के इर्द-गिर्द ही घूमती है। भाटी ने जनता पार्टी से चुनाव लड़ते हुए पहली बार 1980 में कांग्रेस की तब की दिग्गज कांग्रेस नेता कांता खतूरिया को हराया। इसके बाद विजय रथ रवाना हुआ तो अगले लगातार चार चुनाव तक उन्होंने कांता खतूरिया, गोपाल जोशी, हुकमाराम बिश्नोई को हराया और लगातार जीत बड़ी होती गई। इस बीच राजस्थान से लेकर हरियाणा तक के बड़े नेताओं ने भाटी के सामने आए प्रत्याशियों को प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन किया लेकिन देवीसिंह भाटी को हरा नहीं पाए। भाटी की दबंग छवि और लगातार बढ़ते जनसमर्थन के साथ ही उनके व्यक्तिगत समर्थकों का इतना बड़ा हुजूम हो गया कि वे पार्टियों से भी ऊपर दिख रहे थे। ऐसी स्थिति में रघुनाथसिंह भाटी ने कांग्रेस के बैनर से इस विजयी रथ को रोकने का बीड़ा उठाया और 1998 में कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे।
बात 1998 के कोलायत चुनाव की :
लगातार जीत के साथ अपने बढ़ते प्रभाव के बीच देवीसिंह भाटी ने भी लगभग यह मान लिया था कि कोलायत में कोई उनके सामने मजबूती से ताल नहीं ठोक सकता। पार्टियों खासतौर पर कांग्रेस को भी ऐसे कैंडीडेट नहीं मिल रहे थे जो भाटी को चुनौती दे सके। उस समय हदां के रघुनाथसिंह ने टिकट मांगा तो पार्टी ने यह सोचते हुए दिया कि सीट हारनी है टिकट चाहे किसी को दो। ऐसे में रघुनाथ भाटी मैदान में उतरे तो सालों बाद पहली बार कोलायत की चुनावी फिजा बदलती दिखी।

दबंगता और सौम्यता में सियासी जंग :
कहा जाता है कि जिस कोलायत विधानसभा क्षेत्र में देवीसिंह भाटी का प्रतिद्वंद्वी पूरे क्षेत्र में जनसम्पर्क तक नहीं कर पाता था वहां रघुनाथसिंह के चुनाव कार्यालय खुलने लगे। वे गांव-गांव पहुंचे तो स्वागत-सत्कार होने लगा। "दबंगता और सौम्यता" में सियासी जंग छिड़ती दिखी। देवीसिंह भाटी जो कि चुनाव में जीत को लेकर पूरी तरह लापरवाह हो जाने की स्थिति में आ गए थे इस बार सतर्क होना पड़ा। चुनावी नतीजे बताते हैं कि सतर्क होने तक उनकी काफी जमीन छिन चुकी थी लेकिन सतर्क होने के बाद वे "अपने अंदाज" में जमीन बचाने में जुट गए और रिजल्ट हासिल कर लिया।
पहली बार हारते-हारते बचे देवीसिंह भाटी :
कोलायात में चुनावी सफर शुरू करने के बाद यह पहला मौका था जब देवीसिंह भाटी की जीत मात्र 1609 वोटों पर आकर अटक गई। दूसरे शब्दों में कहें तो यह अब तक के चुनावों में सबसे काम अंतर की जीत थी और वे चुनाव हारते-हारते बचे। एक संदेश गया "कोलायत में देवीसिंह भाटी को भी चुनाव हराया जा सकता है।" यह संदेश दिया रघुनाथसिंह भाटी ने। इस चुनाव में भाजपा के देवीसिंह भाटी ने 58327 और कांग्रेस के रघुनाथसिंह भाटी ने 56718 वोट लिए। देवीसिंह भाटी अब तक के सबसे कम अंतर वाली 1609 वोटों से जीते। यहां एक रोचक बात यह है कि इस चुनाव में कन्हैयालाल झँवर निर्दलीय प्रत्याशी थे और 34915 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे। ऐसे में जीत-हार की जंग में बड़ी भूमिका झँवर की मौजूदगी की भी रही।
दुबारा मुकाबला लेकिन स्थितियां बदल गई :
हालांकि उसके बाद अगले ही चुनाव में वे फिर से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में रघुनाथसिंह भाटी मैदान में थे लेकिन तब तक चुनावी स्थितियां बदल चुकी थी। देवीसिंह भाटी का भाजपा से मोहभंग हो गया था। उन्होंने अपनी स्वतंत्र पार्टी राजस्थान सामाजिक न्याय मंच बना ली थी। इसी बैनर पर खुद सहित पूरे राजस्थान में प्रत्याशी मैदान में उतारे। यहां एक रोचक बात यह भी है कि आज के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी उस चुनाव में देवीसिंह भाटी की पार्टी से भाजपा के विरोध में मैदान में उतरे थे। इन ही नहीं आज के भाजपा विधायक ताराचंद सारस्वत और दो बार बीकानेर से भाजपा विधायक रहे गोपाल जोशी भी इसी बैनर से मैदान में थे।
सनम से जुड़ी भावना, फिजा बदली, त्रिकोणीय मुकाबला :
ऐसे में कोलायत की चुनावी फिजा पूरी तरह देवीसिंह भाटी के पक्ष में थी। भाजपा ने उनके सामने तब के युवा तुर्क गोपाल गहलोत को मैदान में उतारा था। इसके बावजूद मुख्य मुकाबला रघुनाथसिंह भाटी और देवीसिंह भाटी के बीच ही रहा। इस बार सामाजिक न्याय मंच के देवीसिंह भाटी की जीत का अंतर 1609 से बढ़कर 10706 हो गया था। देवीसिंह भाटी ने 67197, रघुनाथसिंह भाटी ने 56491 वोट लिए। भाजपा के गोपाल गहलोत 47410 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे।
यहां एक बात गौर करने लायक है कि रघुनाथसिंह भाटी ने जो दो चुनाव देवीसिंह भाटी के सामने लड़े उन दोनों में ही कड़ा त्रिकोणीय मुकाबला था। वर्ष 1998 में कन्हैयालाल झँवर और 2003 में गोपाल गहलोत की मौजूदगी और वोटों के बड़े बंटवारे ने कहीं न कहीं बड़ा लाभ देवीसिंह भाटी को पहुंचाया। इसके बाद एक और चुनाव 2008 में देवीसिंह भाटी जीते। यानी सात बार लगातार विधानसभा चुनाव जीतने वाले राजस्थान के गिने-चुने नेताओं में देवीसिंह भाटी का नाम है।

बेटे भंवरसिंह को मिली विरासत :
भले ही रघुनाथसिंह चुनाव नहीं जीत पाए लेकिन एक निर्विवाद, सौम्य छवि के नेता की पहचान पूरे प्रदेश में छोड़ी। काँग्रेस के राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में उनकी विशिष्ट पहचान बनी और इसी छवि को उनके बेटे कांग्रेस नेता भंवर सिंह भाटी ने अपनाया। नतीजा, पिता की ओर से तैयार की गई जमीन पर उन्हें पहली बार जीत के साथ राजनीतिक बदला लेने का मौका मिल। भंवरसिंह भाटी ने 2013 में पहली बार कोलायत विधानसभा क्षेत्र से देवीसिंह भाटी के सामने चुनाव लड़ा।
कोलायत की राजनीति जानने वाली अच्छी तरह जानते है कि या चुनाव बिल्कुल वैसा ही था जैसा 1998 का देवीसिंह वर्सेज रघुनाथसिंह का चुनाव । जोरदार टक्कर के बीच चुनावी नतीजे की गणित भी लगभग वैसी ही रही जैसी 1998 में रही थी। बस फर्क इतना रहा कि तब देवीसिंह भाटी 1609 वोट से जीते थे और इस बार जीत का अंतर था-1134 वोट। फर्क यह था कि कोलायत में 1980 के बाद पहली बार देवीसिंह भाटी के अलावा कोई जीता था और वह थे भंवरसिंह भाटी। यानी रघुनाथसिंह भाटी के बेटे।

भंवरसिंह भाटी लगातार दो चुनाव जीतने के बाद पिछले वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में देवीसिंह भाटी के पोते अंशुमानसिंह भाटी के हाथों हार गए। अंशुमान की जीत कोलायत के चुनावी इतिहास में सर्वाधिक वोटों की जीत रही। वे 33933 वोटों से जीते। इस चुनाव में भी रोचक त्रिकोण बना और RLP से पूर्व विधायक रेवंतराम पांवर मैदान में रहे। रेवंतराम ने 27854 वोट लिए।
इन सबके बीच अब भी कोलायत की चुनावी फिजा में इन दो भाटी परिवारों के बीच जंग चल रही है। हो सकता है अगला मुकाबला भी इन दो परिवारों के बीच हो। लेकिन जीत-हार की इस चुनावी जंग से इतर एक बात लगभग सभी मानते हैं कि देवीसिंह भाटी को चुनाव हराने में सबसे प्रमुख कारण कोई रहा है तो वह है रघुनाथसिंह भाटी की सौम्यता जिसे उनके पुत्र ने भी पूरी तरह अंगीकार करने की कोशिश की है। ऐसे में जिस तरह कोलायत में राजनीति की बात देवीसिंह भाटी के इर्द-गिर्द ही रहती है उसी तरह इस बातचीत में रघुनाथसिंह भाटी का जिक भी कमोबेश हमेशा रहता है, और रहेगा।

